संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुग संख्यावर्ता ] [ ६६
कला गिनना चाहिए। तीस कलाओं का एक मुहूर्त होता है। तीस मुहूर्तों के सम रात्रि और दिन हुआ करते हैं।६। दिन और रात्रि का विभाग सूर्य किया करता है जो कि मनुष्य का लौकिक होता है।७।
तत्राहः कर्मचेष्टायां रात्रिः स्वप्नाय कल्पते ।
पित्र्ये राज्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः ॥८
कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ।
त्रिंशद्ये मानुषा मासाः पित्र्यो मासस्तु सः स्मृतः ॥६
शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाप्यधिकानि वै ।
पित्र्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते ॥१०
मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत् ।
पितॄणां त्रीणि वर्षाणि संख्यातानीह तानि वै ॥११
दश चैवाधिका मासाः पितृसंख्येह संज्ञिताः ।
लौकिकेनेव मानेन ह्यब्दो यो मानुषः स्मृतः ॥१२
एतद्दिव्यमहोरात्रं शास्त्रे स्यान्निश्चयो गतः ।
दिव्ये राज्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः ॥१३
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ।
ये ते राज्यहनी दिव्ये प्रसंख्यानं तयोः पुनः ॥१४
उनमें दिन तो कर्मों के करने की चेष्टा में लगाया जाता है और रात्रि का समय सोने के लिए कहा जाता है। दिव्य रात्रि और दिन मास होता है। उन दोनों या प्रविभाग फिर होता है।८। उनका कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि होती है। मनुष्यों के जो तीस मास होते हैं वही पितृगणों का मास कहा गया है।६। तीन सौ साठ मासों का पितृगणों का एक वर्ष होता है। यह संख्या मनुष्यों के मासों से विभावित हुआ करती है।१०। मनुष्यों के मान से जो सौ वर्ष होते हैं वे पितृगणों के तीन वर्ष संख्यात किये गये हैं।११। यहाँ पर दश मास अधिक पितृ गणों की संख्या संज्ञा वाली हुई है। लौकिक मान से ही जो मनुष्यों का शब्द कहा गया है।१२। यह दिव्य अर्थात् देवों का अहोरात्र अर्थात् एक दिन और रात है जो शास्त्र निश्चय को प्राप्त हुआ है। दिव्य रात्रि और दिन वर्ष है और उन दोनों का फिर