संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रविभाग है ।१३। वहाँ पर जो दिन है वह उत्तरायण होता है और जो रात्रि है वह दक्षिणायन होता है जो वे दिव्य रात्रि और दिन हैं उनका पुनः प्रसंख्यान है ।१४।
त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः । यन्मानुषं शतं विद्धि दिव्या मासास्त्रयस्तु ते ॥१५ दश चैव तथाऽहानि दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः । त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु । दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः ॥१६ त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः । त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः ॥१७ नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु । अन्यानि नवतिश्चैव ध्रुवः संवत्सरः स्मृतः ॥१८ षड्विंशतिसहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु । वर्षाणि तु शतं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः ॥१९ त्रीण्येव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु ॥२० षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया । दिव्यवर्षसहस्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः ॥२१
मनुष्यों के जो तीस वर्ष होते हैं उतने समय का देवों का दिव्य मास कहा गया है । जो मानवों के एक सौ वर्ष हैं उतने समय का दिव्य तीन मास हुआ करते हैं ।१५। तथा दश दिन हैं—यही दिव्य विधि कही गयी है । तीन सौ साठ जो वर्ष मनुष्यों के होते हैं यह एक दिव्य सम्वत्सर कहा गया है ।१६। मनुष्यों के तीन हजार वर्ष प्रमाण से होते हैं और अन्य वर्ष हैं इतने समय का सप्तषियों का एक वत्सर होता है ।१७। मानवों के जो नौ हजार वर्ष होते हैं और अन्य नब्बे वर्ष हैं-इतने समय का ध्रुव सम्वत्सर हुआ करता है । मनुष्यों के छब्बीस हजार वर्षों का जो समय होता है वह समय होता है वह समय देवों का अर्थात् दिव्य सौ वर्ष हुआ करते हैं—यह विधि कही गयी है ।१८-१९। तीन नियुत ही मनुष्यों के वर्ष कहे जाते हैं ।२०। संख्या के द्वारा साठ सहस्र वर्ष ही संख्यात किये गये हैं । संख्या के ज्ञाता मनीषी गण दिव्य सहस्र वर्ष कहते हैं ।२१।