भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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युग संख्यावर्ता ] [ १०१

इत्येवमृषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया त्विह । दिव्येनेव प्रमाणेन युगसंख्याप्रकल्पनम् ॥२२ चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयोऽब्रुवन् । कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम् ॥२३ पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते । द्वापरं च कलिश्चैव युगान्येतानि कल्पयेत् ॥२४ चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां च कृतं युगम् । तस्य तावच्छती संध्या संध्यायाः संध्यया समः ॥२५ इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु । एकन्यायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥२६ त्रीणि द्वे च सहस्राणि त्रेताद्वापरयोः क्रमात् । त्रिशती द्विशती संध्ये संध्यांशौ चापि तत्समौ ॥२७ कलिं वर्षसहस्रं तु युगमाहुर्द्विजोत्तमाः । तस्यैकशतिका संध्या संध्यांशं संध्याय समः ॥२८

ऋषियों ने यह इस प्रकार से दिव्य संख्या के साथ गान किया है और दिव्य प्रमाण के ही द्वारा युगों की प्रकृष्ट संख्या की कल्पना की जाया करती है ।२२। कविगणों ने भारत वर्ष में चार युग बताये थे । कृतयुग-त्रेता-द्वापर और कलियुग ये चार युगों की चौकड़ी है ।२३। सबसे प्रथम जो युग है उसका कृतयुग अर्थात् सत्ययुग है । इसके उपरान्त त्रेता युग का विधान किया जाता है । फिर द्वापर और इसके बाद कलियुग आता है—इन चार युगों की कल्पना की जाती है ।२४। कृतयुग के बरतने का काल चार सहस्र दिव्य वर्षों का होता है । उस युग की उतने ही सौ वर्षों की सन्ध्या होती है है और सन्ध्या का अंश सन्ध्या के ही समान होता है ।२५। सन्ध्या के सहित और सन्ध्यांशों के सहित अन्य तीनों में एक ही न्याय से सहस्र और शत बरता करते हैं ।२६। त्रेता और द्वापर में क्रम से तीन और दो सहस्र होते हैं । तीन सौ और दो सौ सन्ध्यायैं और सन्ध्यांश भी उनके ही समान हुआ करते हैं ।२७। द्विजोत्तम कलियुग एक सहस्र वर्ष कहते हैं । उसकी एक सौ वर्षों वाली सन्ध्या होती है और सन्ध्या के ही समान सन्ध्या का अंश हुआ करता है ।२८।