संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गांधारा यवनांश्चैव सिंधुसौवीरमण्डलाः । चीनांश्चैव तुषारांश्च पल्लवा गिरिगह्वराः ॥४७ शका भद्राः कुलिंदाश्च पारदा विन्ध्यचूलिकाः । अभीषाहा उलूतांश्च केकया दशमालिकाः ॥४८ ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्चैव वैश्यशूद्रकुलानि तु । कांबोजा दरदाश्चैव बर्बरा अंगलोहिकाः ॥४६
सह्य गिरि के उत्तरान्तों में जहाँ पर गोदावरी नदी बहती है इस सम्पूर्ण पृथिवी में वह प्रदेश परम सुन्दर है ।४३। वहाँ पुर है जिसका गोवर्धन नाम है और इसका निर्माण श्रीराम ने किया था । वहाँ पर श्रीराम के प्रिय स्वर्गीय और अत्युत्तम वृक्ष तथा औषधियाँ हैं ।४४। इन सबका अब रोपण श्रीराम की प्रीति के लिए भरद्वाज मुनि ने किया था । अतएव उन्होंने इस पुरवर का मनोरम उद्देश्य किया था। वाहलीक-वाटधान-आभीर-कालतोयक-अपरान्त-सुह्य-पाञ्चाल-चर्ममंडल-गान्धार-यवन-सिन्धु सौवीर मण्डल-चीन-तुषार-पल्लव-गिरि गह्वरशक-भद्र-कुलिन्द-पारद-विन्ध्यचूलिका-अभी-षाहु-उलूत-केकय-दशमालिक ये सब देश तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कुल, काम्बोज-दरद-उर्वर और अङ्गलोहिक ये सब देश हैं ।४६-४६।
अत्रयः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः । लमकास्तालशालाश्च भूषिका ईजिकैः सह ॥५० एते देशा उदीच्या वै प्राच्यान्देशान्निबोधत । अंगवंगाश्चोलभद्राः किरातानां च जातयः । तोमरा हंसभंगाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥५१ झिल्लिकाश्चाहुकाश्चैव हूणदर्वास्तथैव च ॥५२ अंध्रवाका मुद्गरका अंतर्गिरिबहिर्गिराः । ततः प्लवंगवो ज्ञेया मलदा मलवर्तिकाः ॥५३ समंतराः प्रावृषेया भार्गवा गोपपार्थिवाः । प्राग्ज्योतिषाश्च पुंड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः ॥५४ मल्ला मगधगोनर्दाः प्राच्यां जनपदां स्मृताः । अथापरे जन पदा दक्षिणापथवासिनः ॥५५