भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

भारतदेश ] [ ६५

पंड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च । सेतुका मूषिकाश्चैव क्षपणा वनवासिकाः ॥५६ अत्रिगण-भरद्वाज-प्रस्थल-दशेरक-लमक-तालशाल-भूषिक-ईजिक-ये सब उत्तर दिशा में हैं। अब जो पूर्व दिशा में देश हैं उनका भी आप ज्ञान प्राप्त कर लीजिए। अङ्ग-दङ्ग-चोल भद्र-किरातों की जातियां-तोमर-हंसभंग-काश्मीर-तंगण-झिल्लिक-आहुक-हुणदर्व-अन्ध्रगक-मुद्गर अन्तर्गिरि-बहिर्गिरि—इसके अनन्तर प्लवङ्गव-मलद और मलवर्त्तिक जानने के योग्य हैं। ।५०-५३। समंतर-प्रावृषेय-भार्गव-गोपपार्थिव-प्राग्ज्योतिष-पुण्ड्र-विदेह-ताम्रलिप्तिक-मल्ल-मगध और गोनर्द—ये जनपद पूर्वी दिशा में हैं ऐसा कहा गया है। इसके उपरान्त दूसरे दक्षिणा पथवासी जनपद हैं ।५३-५४। पण्ड्य-केरल-चोल-कुल्य-सेतुक-मूषिक-क्षपण और वनवासिक देश हैं ।५६।

महाराष्ट्रा महिषिकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः । आभीराश्च सहैषीका आटव्या सारवास्तथा ॥५७ पुलिंदा विन्ध्यमौलीया वैदर्भा दंडकैः सह । पौरिका मौलिकाश्चैव अश्मका भोगवर्द्धनाः ॥५८ कौंकणाः कुंतलाश्चांध्राः पुलिन्दाङ्गारमारिषाः । दाक्षिणाश्चैव ये देशा अपरांस्तान्निबोधत ॥५९ सूर्य्यारकाः कलिवना दुर्गालाः कुन्तलैः । पौलेयाश्च किराताश्च रूपकास्तापकैः सह ॥६० तथा करीत्तयश्चैव सर्वे चैव करंधराः । नासिकाश्चैव ये चान्ये ये चैवांतरनर्मदाः ॥६१ सहकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि । कच्छिपाश्च सुराष्ट्राश्च आनर्ताश्चार्बुदै सह ॥६२ इत्येते अपरांताश्च शृणुध्वं विन्ध्यवासिनः । मलदाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह ॥६३

महाराष्ट्र-महिषिक-कलिङ्ग-सब ओर आभीर-सहैषीक-आटव्य-सारव-पुलिन्द-विन्ध्य मौलेय-वैदर्भ-दण्डक-पौरिक-मौलिक-अश्मक-भोग वर्धन-कोङ्कण-कुन्तल-आन्ध्र-पुलिन्द-अंगार-मारिष-ये सब देश दक्षिणा पथ वासी