संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तास्तु नद्यः सरस्वत्यः सर्वा गंगाः समुद्रगाः । विश्वस्य मातरः सर्वा जगत्पापहराः स्मृताः ॥३६
तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः । तास्विमे कुरुपांचालाः शाल्वा माद्रेयजांगलाः ॥४०
शूरसेना भद्रकारा बोधाः सहपटच्चराः । मत्स्याः कुशलयाः सौशल्याः कुंतलाः काशिकौशलाः ॥४१
गोधा भद्राः कलिंगाश्च मागधाश्चोत्कलैः सह । मध्यदेश्या जनपदाः प्रायशस्तत्र कीर्त्तिताः ॥४२
कृतमाला-ताम्रपर्णी-पुष्पजाती-उत्पलावती—ये सब नदियां मलय पर्वत से अभिजात हुई हैं जिनका जल बहुत ही शीतल और शुभ है ।३६। त्रिसामा-ऋषिकुल्या-बंजुला-त्रिदिवा-बला-लांगूलिनी-वंशधरा-ये सब महेन्द्र-गिरि की तनया कही गयी हैं ।३७। ऋषिकुल्या-मन्दगा-मन्द गामिनी-कृपा-पलाशिनी—ये नदियां शुक्तिमान् पर्वत से समुत्पत्ति पाने वाली है ।३८। ये सब नदियां सरस्वती हैं और सब समुद्र में गमन करने वाली गङ्गा है । ये सभी इस विश्व की मातायें हैं और जगत् के समस्त पापों के हरण करने वाली कही गयी हैं ।३६। इन सब नदियों की अन्य सैकड़ों और हजारों ही उप नदियां हैं । उनमें ये कुरु पाञ्चाल-शाल्व-माद्रेय-जांगल-शूरसेन-भद्रकार-बोध-सहपटच्चर-मत्स्य कुशल्य-कुन्तल-काशि-कौशल-गोध-भद्र-कलिंग-मागध-उत्कल-मध्य देश में होने वाले जनपद प्रायः करके वहाँ पर कीर्त्तित किये गये हैं ।४०-४२।
सह्यस्य चोत्तरांतेषु यत्र गोदावरी नदी । पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः ॥४३
तत्र गोवर्द्धनं नाम पुरं रामेण निर्मितम् । रामप्रियार्थ स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः ॥४४
भरद्वाजेन मुनिना तत्प्रियार्थेऽवरोपिताः । अतः पुरवरोद्देशस्तेन जज्ञे मनोरमः ॥४५
वाहलीका वाटधानाश्च आभीरा कालतोयकाः । अपरांताश्च सुह्याश्च पाञ्चालाश्चर्ममंडलाः ॥४६