भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

लोककल्पनम् (२) ] [ ६७

वृष्टि के न होने से शुष्क हो रहे थे और जिनके द्वारा वे शुष्क थे उन्हीं के द्वारा बहुत तापित किये गये थे अर्थात् शुष्क वे एकदम प्राप्त हो गये थे ।१२५। इस समय में कहीं पर भी परित्राण नहीं था और वे सब विवश होकर सूर्यं के प्रखर प्रतप्त किरणों से निःशेष रूप से दग्ध हो गये थे। इनमें सभी स्थावर-जङ्गम और धर्म तथा अधर्म आदि थे ।१२६।

दग्धदेहास्तदा ते तु धूतपापा युगात्यये ।
ख्यातातपा विनिर्मुक्ताः शुभया चातिबंधया ॥१२७
ततस्ते ह्युपपद्यंते तुल्यरूपैर्जनैर्जनाः ।
उषित्वा रजनीं ते च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥१२८
पुनः सर्गे भवंतौह मानस्यो ब्रह्मणः प्रजाः ।
ततस्तेषु प्रपन्नेषु जनैस्त्रैलोक्यवासिषु ॥१२६
निर्दग्धेषु च लोकेषु तदा सूर्यैस्तु सप्तभिः ।
वृष्ट्या क्षितौ प्लावितायां विजनेष्वर्णवेषु वा ॥१३०
समुद्राश्चैव मेघाश्च आपश्चैवाथ पार्थिवाः ।
शरमाणा व्रजन्त्येव सलिलाख्यास्तथाचलाः ॥१३१
आगतागतिकं चैव यदा तु सलिलं बहु ।
संछाद्येमां स्थितां भूमिमर्णवाख्यं तदाऽभवत् ॥१३२
आभाति यस्माच्चाभासाद्भाशब्दः कांतिदीप्तिषु ।
स सर्वः समनुप्राप्ता मासां भाभ्यो विभाव्यते ॥१३३

उस अवसर पर युग के अत्यय में वे देहों के दग्ध हो जाने पर निष्पाप हो गये थे तथा ख्यातातप और शुभ बन्धा से विनिर्मुक्त थे ।१२७। इसके उपरान्त वे तुल्यरूप वाले जनों के स्वाका जन उत्पन्न होते हैं। और वे अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्मा की रात्रि में वहाँ निवास करके फिर सृजन की वेला में ब्रह्माजी की मानसी प्रजा होती हैं। फिर जनों के साथ त्रैलोक्य वासी उनके प्रयत्न होने पर तथा संतप्त सूर्य की प्रखर किरणों से उस समय में लोकों के निर्दग्ध हो जाने पर वृष्टि के द्वारा सम्पात से भूमि के प्लावित होने पर तथा विजन अर्णवों में निमग्न हो जाने पर समुद्र-मेघ-जल और पार्थिव सब शरमाण होते तथा अचल सलिल से ज्ञान वाले होकर सब ही गमन कर जाया करते हैं अर्थात् विनष्ट हो जाते हैं ।१२८-१३१। जिस समय