भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निरञ्जन हैं । ११५-११६। प्राकृत सर्ग में कारणों से उपेत हैं और अपनी आत्मा में ही व्यवस्थित है । और आत्मा को प्रख्यापित करके तत्व से यह प्रकृति है ।११७। पुरुषान्य से यह प्रतीत प्रवृत्त नहीं होती है। फिर उन साकरणात्माओं का सर्ग प्रवृत्त होता है ।११८। युक्त तत्व दर्शियों का संयोग प्रकृति जाननी चाहिए । अपुनर्भारगामी उनकी वह उपवर्गिणी है ।११६। अभावतः पुनः सत्यं शांतानामर्चिषामिव । ततस्तेषु गतेषूध्वं त्रैलोक्यात् मुदात्मसु ॥१२० ते सार्द्धं यैर्महर्लोकस्तदानासादितस्तु वै । तच्छिष्या ये ह तिष्ठंति कल्पदाह उपस्थिते ॥१२१ गन्धर्वाद्याः पिशाचाश्च मानुषा ब्राह्मणादयः । पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराः ससरीसृपाः ॥१२२ तिष्ठत्सु तेषु तत्कालं पृथिवीतलवासिषु । सहस्रं यत्तु रश्मीनां सूर्यस्येह विनश्यति ॥१२३ ते सप्त रश्मयो भूत्वा एकैको जायते रविः । क्रमेण शतमानास्ते त्रींल्लोकान्प्रदहंत्युत ॥१२४ जङ्गमान्स्थावराँश्चैव नदीः सर्वांश्च पर्वतान् । शुष्केपूर्वावृष्ट्या यैस्तंश्चैव प्रतापिताः ॥१२५ तदा ते विवशाः सर्वे निर्दग्धाः सूर्यरश्मिभिः । जङ्गमाः स्थावराश्चैव धर्माधर्मादिकास्तु ते ॥१२६ अर्चियों की भाँति शान्तों के अभाव से फिर सत्य है । इसके अनन्तर मुदात्मा उनके त्रैलोक्य से ऊपर गत हो जाने पर वे जिनके द्वारा उस समय में महर्लोक अनासादित है । कल्पदाह के उपस्थित होने पर जो उनके शिष्य हैं स्थित रहा करते हैं ।१२०-१२१। गन्धर्व आदिक-पिशाच-मानुष और ब्राह्मण आदि पशु-पक्षी-स्थावर-सरीसृप उस समय में पृथवीतल वाली उनके स्थित रहने पर यहाँ पर सूर्य की सहस्र रश्मियाँ विनष्ट हो जाती हैं ।१२२-१२३। वे सब सूर्य की किरणें सात रश्मियाँ होकर एक-एक सूर्य हो जाया करता है वे क्रम से शत स्वरूप होकर तीनों लोकों को प्रदान किया करते हैं ।१२४। जङ्गम और स्थावर-नदी और सब पर्वतों को जो पूर्ण में ही