संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निरञ्जन हैं । ११५-११६। प्राकृत सर्ग में कारणों से उपेत हैं और अपनी आत्मा में ही व्यवस्थित है । और आत्मा को प्रख्यापित करके तत्व से यह प्रकृति है ।११७। पुरुषान्य से यह प्रतीत प्रवृत्त नहीं होती है। फिर उन साकरणात्माओं का सर्ग प्रवृत्त होता है ।११८। युक्त तत्व दर्शियों का संयोग प्रकृति जाननी चाहिए । अपुनर्भारगामी उनकी वह उपवर्गिणी है ।११६। अभावतः पुनः सत्यं शांतानामर्चिषामिव । ततस्तेषु गतेषूध्वं त्रैलोक्यात् मुदात्मसु ॥१२० ते सार्द्धं यैर्महर्लोकस्तदानासादितस्तु वै । तच्छिष्या ये ह तिष्ठंति कल्पदाह उपस्थिते ॥१२१ गन्धर्वाद्याः पिशाचाश्च मानुषा ब्राह्मणादयः । पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराः ससरीसृपाः ॥१२२ तिष्ठत्सु तेषु तत्कालं पृथिवीतलवासिषु । सहस्रं यत्तु रश्मीनां सूर्यस्येह विनश्यति ॥१२३ ते सप्त रश्मयो भूत्वा एकैको जायते रविः । क्रमेण शतमानास्ते त्रींल्लोकान्प्रदहंत्युत ॥१२४ जङ्गमान्स्थावराँश्चैव नदीः सर्वांश्च पर्वतान् । शुष्केपूर्वावृष्ट्या यैस्तंश्चैव प्रतापिताः ॥१२५ तदा ते विवशाः सर्वे निर्दग्धाः सूर्यरश्मिभिः । जङ्गमाः स्थावराश्चैव धर्माधर्मादिकास्तु ते ॥१२६ अर्चियों की भाँति शान्तों के अभाव से फिर सत्य है । इसके अनन्तर मुदात्मा उनके त्रैलोक्य से ऊपर गत हो जाने पर वे जिनके द्वारा उस समय में महर्लोक अनासादित है । कल्पदाह के उपस्थित होने पर जो उनके शिष्य हैं स्थित रहा करते हैं ।१२०-१२१। गन्धर्व आदिक-पिशाच-मानुष और ब्राह्मण आदि पशु-पक्षी-स्थावर-सरीसृप उस समय में पृथवीतल वाली उनके स्थित रहने पर यहाँ पर सूर्य की सहस्र रश्मियाँ विनष्ट हो जाती हैं ।१२२-१२३। वे सब सूर्य की किरणें सात रश्मियाँ होकर एक-एक सूर्य हो जाया करता है वे क्रम से शत स्वरूप होकर तीनों लोकों को प्रदान किया करते हैं ।१२४। जङ्गम और स्थावर-नदी और सब पर्वतों को जो पूर्ण में ही
लोककल्पनम् (२) ] [ ६७
वृष्टि के न होने से शुष्क हो रहे थे और जिनके द्वारा वे शुष्क थे उन्हीं के द्वारा बहुत तापित किये गये थे अर्थात् शुष्क वे एकदम प्राप्त हो गये थे ।१२५। इस समय में कहीं पर भी परित्राण नहीं था और वे सब विवश होकर सूर्यं के प्रखर प्रतप्त किरणों से निःशेष रूप से दग्ध हो गये थे। इनमें सभी स्थावर-जङ्गम और धर्म तथा अधर्म आदि थे ।१२६।
दग्धदेहास्तदा ते तु धूतपापा युगात्यये ।
ख्यातातपा विनिर्मुक्ताः शुभया चातिबंधया ॥१२७
ततस्ते ह्युपपद्यंते तुल्यरूपैर्जनैर्जनाः ।
उषित्वा रजनीं ते च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥१२८
पुनः सर्गे भवंतौह मानस्यो ब्रह्मणः प्रजाः ।
ततस्तेषु प्रपन्नेषु जनैस्त्रैलोक्यवासिषु ॥१२६
निर्दग्धेषु च लोकेषु तदा सूर्यैस्तु सप्तभिः ।
वृष्ट्या क्षितौ प्लावितायां विजनेष्वर्णवेषु वा ॥१३०
समुद्राश्चैव मेघाश्च आपश्चैवाथ पार्थिवाः ।
शरमाणा व्रजन्त्येव सलिलाख्यास्तथाचलाः ॥१३१
आगतागतिकं चैव यदा तु सलिलं बहु ।
संछाद्येमां स्थितां भूमिमर्णवाख्यं तदाऽभवत् ॥१३२
आभाति यस्माच्चाभासाद्भाशब्दः कांतिदीप्तिषु ।
स सर्वः समनुप्राप्ता मासां भाभ्यो विभाव्यते ॥१३३
उस अवसर पर युग के अत्यय में वे देहों के दग्ध हो जाने पर निष्पाप हो गये थे तथा ख्यातातप और शुभ बन्धा से विनिर्मुक्त थे ।१२७। इसके उपरान्त वे तुल्यरूप वाले जनों के स्वाका जन उत्पन्न होते हैं। और वे अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्मा की रात्रि में वहाँ निवास करके फिर सृजन की वेला में ब्रह्माजी की मानसी प्रजा होती हैं। फिर जनों के साथ त्रैलोक्य वासी उनके प्रयत्न होने पर तथा संतप्त सूर्य की प्रखर किरणों से उस समय में लोकों के निर्दग्ध हो जाने पर वृष्टि के द्वारा सम्पात से भूमि के प्लावित होने पर तथा विजन अर्णवों में निमग्न हो जाने पर समुद्र-मेघ-जल और पार्थिव सब शरमाण होते तथा अचल सलिल से ज्ञान वाले होकर सब ही गमन कर जाया करते हैं अर्थात् विनष्ट हो जाते हैं ।१२८-१३१। जिस समय
६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
में आगता गतिक जल प्रचुर मात्रा में हो जाता है तो वह इस भूमि को संच्छादित करके सभी समुद्र नाम वाला हो जाता है ।१३२। भी शब्द जिस आभास से कान्ति-दीप्तियों में आभास होता है। वह सभी भावों को समनु प्राप्त हुए जो कि भावों से विभावित होता है ।१३३।
तदंतस्तनुते यस्मात्सर्वां पृथिवी समंततः ।
धातुस्तनोति विस्तारं ततोपतनवः स्मृताः ॥१३४
शार इत्येव शीर्णे तु नानार्थो धातुरुच्यते ।
एकार्णवे भवन्त्यापो न शीर्णास्ते न ता नराः ॥१३५
तस्मिन् युगसहस्रांते संस्थिते ब्रह्मणोऽहनि ।
तावत्कालं रजन्यां च वर्तन्त्यां सलि़लात्मनः ॥१३६
ततस्ते सलिले तस्मिन् नष्टाग्नौ पृथिवीतले ।
प्रशांतवातेऽन्धकारे निरालोके समंततः ॥१३७
येनैवाधिष्ठितं हीदं ब्रह्मणः पुरुषः प्रभुः ।
विभागमस्य लोकस्य प्रकर्तुं पुनरैच्छत ॥१३८
एकार्णवे ततस्तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
तदा भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१३९
सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो ह्यतींद्रियः ।
ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥१४०
सत्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु स शून्यं लोकमैक्षत ।
अनेनाद्येन पादेन पुराणं परिकीर्तितम् ॥१४१
उसके अन्दर जिससे सभी ओर से इस पृथिवी का विस्तार किया करता है। धातु विस्तार को फैलाता है उसके पश्चात् उपतनु कहे गये हैं ।१३४। शार यही ही शीर्ण हो जाने पर अनेक अर्थ धातु कहा जाया करता है। एकमात्र समुद्र में जल ही होते हैं। उसमे वे नर शीर्ण नहीं होते हैं ।१३५। उस एक सहस्र युगों के अन्त में ब्रह्मा के दिन के संस्थित होने पर तब तक के समय में सलिलात्मा की रात्रि के बसने पर रजनी ही रहती है ।१३६। इसके उपरान्त उस जलमें विनष्ट अग्नि वाले पृथ्वी तल में-वायु के एक दम प्रशान्त होने पर एक दम अन्धकार रहता है और सभी ओर आलोक
कल्प प्रतिस्रन्धि वर्णनम् ] [ ६६
का अभाव होता है ।१३७। जिसके द्वारा यह अधिष्ठित है ब्रह्मा के पर पुरुष प्रभु ने इस लोक के विभाग करने की इच्छा की थी ।१३८। उस समय में केवल एक ही समुद्र था और सभी चर तथा अचर जगत् एकदम विनष्ट हो गया था । तब वह ब्रह्मा सहस्रों पादों वाले होते हैं ।१३६। वह पुरुष सहस्रों शीर्षों वाले हैं जिनका वर्ण सुवर्ण के समान है और जो इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। उस समय में नारायण नामधारी ब्रह्माजी जल में शयन कर रहे थे ।१४०। सत्व के उद्रेक से प्रकृष्ट ज्ञान वाले उन्होंने सम्पूर्ण लोक को शून्य देखा था । इस आद्य पाद ने पुराण को परिकीर्तित किया था ।१४१।
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम्
सूत उवाच—इत्येवं प्रथमं पादं प्रकृत्यर्थं प्रकीर्तितम् ।
श्रुत्वा तु संहृष्टमनाः कापेयः संशयायति ॥१
आराध्य वचसा सूतं तस्यार्थं त्वपरां कथाम् ।
अथ प्रभृति कल्पज्ञ प्रतिसंधिः प्रचक्षते ॥२
समतीतस्य कल्पस्य वर्तमानस्य चानयोः ।
कल्पयोरंतरं यत्र प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ।
एतद्वेदितुमिच्छामि यथावत्कुशलो ह्यसि ॥३
कापेयेनैवमुक्तस्तु सूतः प्रवदतां वरः ।
त्रैलोक्यस्योद्भवं कृत्स्नदाख्यातुमुपचक्रमे ॥४
सूत उवाच—अत्र वै वर्णयिष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ।
कल्पं भूतं भविष्यं च प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ॥५
मन्वन्तराणि कल्पेषु यानि यानि च सुव्रताः ।
यश्चायं वर्तते कल्पो वाराहः सांप्रतः शुभः ॥६
अस्मात्कल्पात्तु यः पूर्वः कल्पोऽतीतः सनातनः ।
तस्य चास्य च कल्पस्य मध्यावस्थां निबोधत ॥७
श्री सूतजी ने कहा—यह प्रकीर्ति के लिए प्रथम पाद कीर्तित किया है । इसका श्रवण करके कापेय के मन में बहुत ही संहर्ष हुआ था किन्तु उसके मन में संशय भी होता है ।१। उन्होंने वाणी के द्वारा सूतजी की
७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आराधना की थी और उसका अर्थ तथा दूसरी कथा को श्रवण करने की इच्छा की थी। आज से लेकर कल्पज्ञ प्रति सन्धि कहा जाता है। २। बीत हुए कल्प का और वर्तमान कल्प की इन दोनों का अन्तर और जहां पर उन दोनों की प्रतिसन्धि है। यह मैं जानना चाहता हूँ क्योंकि आप ठीक प्रकार से यह बताने के लिए परम कुशल हैं। ३। कापेय के द्वारा इस प्रकार से पूछे जाने पर प्रवचन करने वालों में श्रेष्ठ सूतजी ने यह सम्पूर्ण ही करने का उपक्रम किया था। ४। श्री सूतजी ने कहा था-हे सुन्दर व्रतों वालो! इस विषय में जो कुछ भी है वह सभी यथार्थ रूप से वर्णन करूंगा। कल्प जो हो गये हैं और आगे होने वाले हैं तथा इन दोनों की जो प्रति सन्धि है-इसको भी बताऊंगा। ५। इन कल्पों में जो-जो भी मन्वन्तर है और जो यह कल्प वर्तमान है वह इस समय कल्प परम शुभ वाराह है। ६। इस कल्प से पूर्व में होने वाला जो कल्प था जो कि सनातन व्यतीत हो गया है उसकी और इस कल्प की जो मध्य में होने वाली अवस्था है उसका ज्ञान अब प्राप्त करलो। ७।
प्रत्यागते पूर्वकल्पे प्रतिसंधि विनाऽनघाः । अन्यः प्रवर्त्तते कल्पो जनलोकादयः पुनः ॥८
व्युच्छिन्नप्रतिसंधिस्तु कल्पात्कल्पः परस्परम् । व्युच्छिद्यंते प्रजाः सर्वाः कल्पांते सर्वशस्तदा ॥६
तस्मात्कल्पात्तु कल्पस्य प्रतिसंधिर्न विद्यते । मन्वंतरे युगाख्यानामविच्छिन्नास्तु संधयः ॥१०
परस्परात् प्रवर्त्तंते मन्वंतरयुगैः सह । उक्ता ये प्रक्रियार्थेन पूर्वकल्पाः समासतः ॥११
तेषां परार्द्धकल्पानां पूर्वो यस्मात्तु यः परः । आसीत्कल्पे व्यतीते वै परार्द्धात्परमस्तु यः ॥१२
कल्पास्त्वन्ये भविष्या ये ह्यपरार्द्धगुणीकृताः । प्रथमः सांप्रतस्तेषां कल्पो यो वर्तते द्विजाः ॥१३
अस्मिन्पूर्वे परार्द्धे तु द्वितीयः पर उच्यते । एष संस्थितकालन्तु प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥१४
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७१
हे अनघो ! प्रतिसन्धि के बिना पूर्वकल्प के प्रत्यागत होने पर अन्य कल्प प्रवृत्त होता है और फिर जन लोकादिक होते हैं।८। व्युच्छिन्न प्रति-सन्धि वाला कल्प से परस्पर में होता है। उस अवसर पर सभी ओर से कल्प के अन्त में सम्पूर्ण प्रजा व्युच्छिन्न हुआ करती है।६। उस कल्प से कल्प की प्रतिसन्धि नहीं होती है। मन्वन्तर में युगाख्यों की सन्धियां अविच्छिन्न होती हैं।१०। मन्वन्तर युगों के साथ परस्पर से प्रवृत्त होता है। जो संक्षेप से प्रक्रियार्थ के द्वारा पूर्व कल्प कहे हैं।११। उन परार्ध कल्पों के पूर्व जिससे जो पर है। पूर्व कल्प के व्यतीत होने पर परार्ध से परम जो था।१२। जो अन्य भविष्य में होने वाले कल्प हैं वे अपरार्ध गुणी कृत हैं। हे द्विजगणो ! उनमें अब होने वाला कल्प है जो कि इस समय में वर्तमान है।१३। इसमें पूर्व परार्ध में जो द्वितीय है वह पर कहा जाता है। यह संस्थित काल वाला है और फिर प्रत्याहार कहा गया है।१४।
अस्मात्कल्पात्ततः पूर्वं कल्पोऽतीतः पुरातनः ।
चतुर्युगसहस्रांते सह मन्वंतरैः पुरा ॥१५
क्षीणे कल्पे ततस्तस्मिन् दाहकाल उपस्थिते ।
तस्मिन्काले तदा देवा आसन्वैमानिकास्तु ये ॥१६
नक्षत्रग्रहताराश्च चन्द्रसूर्यादयस्तु ते ।
अष्टाविंशतिरेवैताः कोट्यस्तु सुकृतात्मनाम् ॥१७
मन्वंतरे यथैकस्मिन् चतुर्दशसु वै तथा ।
त्रीणि कोटिशतान्यासन् कोट्यो द्विनवतिस्तथा ॥१८
अथाधिका सप्ततिश्च सहस्राणां पुरा स्मृता ।
एकैकस्मिंस्तु कल्पे वै देवा वैमानिकाः स्मृताः ॥१९
अथ मन्वंतरेष्वासंश्चतुर्दशसु खे दिवि ।
देवाश्च पितरश्चैव ऋषयोऽमृतपास्तथा ॥२०
तेषामनुचराश्चैव पत्न्यः पुत्रास्तथैव च ।
वर्णाश्रमातिरिक्ताश्च तस्मिन्काले तु खे सुराः ॥२१
तैस्तैः सायुज्यगैः सार्द्धं प्राप्ते वस्तुमये तदा ।
तुल्यनिष्ठाभवन्सर्वे प्राप्ते ह्याभूतसंप्लवे ॥२२
७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
फिर इस कल्प से पूर्ण में होने वाला अतीत पुरातन कल्प है जो पहिले एक सहस्र चारों युगों की चोकड़ी के अन्त में मन्वन्तरों के साथ है। ।१५। फिर उस कल्प के क्षीण हो जाने पर और दाह काल के उपस्थित होता है। उस समय में तब जो वैमानिक देव हैं वे थे ।१६। वे नक्षत्र-ग्रह और नारायण तथा चन्द्र सूर्य आदिक हैं । वे सब अट्ठाईस हैं। सुकृतात्माओं की करोड़ों की संख्या है अर्थात् जिन्होंने सुकृत किया है उन्हीं की करोड़ों संख्या है ।१७। जिस प्रकार से एक मन्वन्तर में तथा चौदहों में वे तीन करोड़ थे तथा बानवे करोड़ थे ।१८। इसके अनन्तर अर्थात् विमानों में रहने वाले देवगण कहे गये हैं ।१९। इसके अनन्तर आकाश में दिवलोक में चौदह मन्वन्तरों में थे । उनमें देवगण-पितृगण-ऋषिगण तथा अमृत के पान करने वाले थे ।२०। उनके अनुचर हैं, उनकी पत्नियां हैं और उनके पुत्र भी होते हैं। उस काल में आकाश में सुरगण वर्णों और आश्रमों से अतिरिक्त थे । ।२१। उस काल में वस्तुओं से परिपूर्ण प्राप्त होने पर उन-उन सायुज्य में गमन करने वालों के साथ में थे । आभूत संप्लव अर्थात् महा प्रलय के प्राप्त होने पर वे तुल्य निष्ठा वाले हुए थे ।२२।
ततस्तेऽवश्यभावित्वाद् बुद्ध्याः पर्यायमात्मनः । त्रैलोक्यवासिनो देवा इह तानाभिमानिकः ॥२३
स्थितिकाले तदा पूर्णे आसन्ने पश्चिमोत्तरे । कल्पावसानिका देवास्तस्मिन्प्राप्ते ह्युपप्लवे ॥२४
तदोत्सुका विषादेन त्यक्तस्थानानि भागशः । महर्लोकाय संविग्नास्ततस्ते दधिरे मनः ॥२५
ते युक्तानुपपद्यंते महतीं च शरीरिके । विशुद्धिबहुलाः सर्वे मानसीं सिद्धिमास्थिताः ॥२६
तै कल्पवासिभिः सार्द्धं महानासादितस्तदा । ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैस्तद्भवैश्चापरैर्जनैः ॥२७
गत्वा तु ते महर्लोकं देवसंघाश्चतुर्दश । ततस्ते जनलोकाय सोद्वेगा दधिरे मनः ॥२८
इसके उपरान्त वे तान के अभिमानी देवगण जो त्रैलोक्य के निवासी थे यहाँ पर आत्मा की बुद्धि के अवश्य भावी होने से थे ।२३। उस काल में
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७३
स्थिति का समय पूर्ण हो चुका था और पश्चिमोत्तर में आसन्न था। जो देव कल्प में अवसान प्राप्त होने वाले थे वे उस उपप्लव को प्राप्त हुआ देखने वाले थे ।२४। उस अवसर में उत्सुक हुए और विषाद से भागों में स्थानों को व्यक्त करके फिर उन्होंने सविग्न होते हुए अयन भाग महर्लोक के लिए बनाया था ।२५। वे युक्तों को उपपन्न होते हैं और शरीर में महती को प्राप्त होते हैं वे सब प्रचुर विशुद्धि से समन्वित थे तथा मानसी सिद्धि में समास्थित हुए थे ।२६। उस समय में उन कल्पवासियों के साथ महान आसादित हुआ था। उनके साथ में गमन करने वाले ब्राह्मण—क्षत्रिय—वैश्य और अपरजन भी थे। वे चौदह देवों के संघ महर्लोक में प्राप्त हो गये थे। फिर उस महर्लोक से गमन करके बड़े उद्वेग के सहित उन्होंने अपना मन जनलोक में जाने के लिए किया था ।२७-२८।
एतेन क्रमयोगेन ययुस्ते कल्पवासिनः ।
एवं देवयुगानां तु सहस्राणि परस्परम् ॥२९
विशुद्धिबहुलाः सर्वे मानसीं सिद्धिमास्थिताः ।
तैः कल्पवासिभिः सार्द्धं जन आसादितस्तु वै ॥३०
तत्र कल्पान्दश स्थित्वा सत्यं गच्छंति वै पुनः ।
गत्वा ते ब्रह्मलोकं वै अपरावर्तिनीं गतिम् ॥३१
आधिपत्यं विमाने वै ऐश्वर्येण तु तत्समाः ।
भवंति ब्रह्मणा तुल्या रूपेण विषयेण च ॥३२
तत्र ते ह्यवतिष्ठंते प्रीतियुक्ताश्च संयमान् ।
आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह ॥३३
अवश्यभाविनाथेन प्राकृतेनैव ते स्वयम् ।
मानार्चनाभिः संबद्धास्तदा तत्कालभाविताः ॥३४
स्वपतो बुद्धिपूर्वं तु बोधो भवति वै यथा ।
तथा तु भावितो सेवां तथानंदः प्रवर्तते ॥३५
इसी क्रम के योग से वे कल्पवासी चले गये थे। इस प्रकार से सहस्रों ही देवों के युग थे ।२६। सभी विशुद्धि की प्रचुरता वाले थे और अतएव वे सब मानसी सिद्धि में समास्थित थे। उनने कल्प वासियों के साथ जनलोक
७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
को प्राप्त किया था ।३०। वहाँ जनलोक में दश कल्पों तक स्थित होकर फिर सत्य लोक को चले जाते हैं । वे ब्रह्मलोक को प्राप्त करके अपरावर्त्तिनी गति को प्राप्त हो जाते हैं ।३१। वे विमान में आधिपत्य पाकर ऐश्वर्य से उनके ही समान हो जाया करते हैं । फिर वे ब्रह्माजी के ही तुल्य हो जाया करते हैं और रूप तथा विषय के द्वारा ब्रह्मा के समान हैं ।३२। वहाँ पर वे प्रीति से युक्त होते हुए संयमों को अवस्थित हुआ करते हैं । वहाँ पर ब्रह्मा का आनन्द प्राप्त करके ब्रह्माजी के ही साथ मुक्ति को प्राप्त हो जाया करते हैं ।३३। प्राकृत अवश्य भावी अर्थ से वे स्वयं उस समय में उसका से भावित होते हुए सम्मान और अर्चन आदि के द्वारा सम्बद्ध होते हैं ।३४। जिस प्रकार से बुद्धिपूर्वक शयन करते हुए बोध होता है उसी भाँति सेवा के भावित होने पर वैसा ही आनन्द प्रवृत्त होता है ।३५।
प्रत्याहारैस्तु भेदानां येषां भिन्नानि शुष्मिणाम् । तैः सार्द्धं वर्द्धते तेषां कार्याणि करणानि च ॥३६ नानात्वदर्शिनां तेषां ब्रह्मलोकनिवासिनाम् । विनिवृत्ताधिकाराणां स्वेन धर्मेण तिष्ठताम् ॥३७ ते तुल्यलक्षणाः सिद्धाः शुद्धात्मानो निरंजनाः । प्राकृते करणोपेताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥३८ प्रख्यापयित्वा चात्मानं प्रकृतिस्त्वेषु तत्त्वतः । पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता तत्प्रवर्तते ॥३६ प्रवर्तिते पुनः सर्गे तेषां साकारणात्मनाम् । संयोगे प्रकृतिर्ज्ञेया मुक्तानां तत्त्वदर्शिनाम् ॥४० तत्रोपवर्गिणां तेषां न पुनर्मार्गगामिनाम् । अभावः पुनरुत्पन्नः शांतानामर्चिषामिव ॥४१ ततस्तेषु गतेषूर्ध्वं त्रैलोक्येषु महात्मसु । एतैः सार्द्धं महर्लोकस्तदानासादितस्तु वै ॥४२
जिन शुष्मियों के भेदों के प्रत्याहारों से भिन्न हैं उनके कार्य और करण वर्धित होते हैं ।३६। वे नानात्व के देखने वाले और ब्रह्मलोक के निवास करने वाले हैं। निवृत्त अधिकारों वाले और अपने धर्म में स्थित
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७५
रहने वाले हैं ।३७। वे समान लक्षणों वाले सिद्ध हैं शुद्ध आत्माओं वाले तथा निरञ्जन हैं । प्राकृत में वे करणों से उपेत हैं और अपनी आत्मा में ही व्यवस्थित हैं ।३८। और आत्मा को प्रख्यापित करके तात्विक रूप से यह प्रकृति अन्य पुरुषों के बहुत्व होने से प्रतीत होती हुई प्रवृत्त होती है ।३६। साकारणात्मा उनके फिर सर्ग के प्रवर्त्तित होने पर मुक्त तत्व दर्शियों के संयोग में प्रवृत्ति जाननी चाहिए ।४०। वहाँ पर उपवर्गी और फिर मार्गगामी न होने वाले इनका पुनः शान्त अर्चियों के ही समान अभाव उत्पन्न हो गया है ।४१। इसके अनन्तर उन महान् आत्मा वाले त्रैलोकों के ऊपर की ओर गत होने पर उस समय में इनके साथ महर्लोक निश्चय ही आसादित नहीं हुआ था ।४२।
तच्छिष्या वै भविष्यन्ति कल्पदाह उपस्थिते ।
गंधर्वाद्याः पिशाचाश्च मानुषा ब्राह्मणादयः ॥४३
पशवः पक्षिणश्चैव स्थावराश्च सरीसृपाः ।
तिष्ठत्सु तेषु तत्कालं पृथिवीतलवासिषु ॥४४
सहस्रं यत्तु रश्मीनां स्वयमेव विभाव्यते ।
तत्सप्तरश्मयो भूत्वा एकैको जायते रविः ॥४५
क्रमेणोत्तिष्ठमानास्ते त्रींल्लोकान्प्रदहंत्युत ।
जङ्गमाः स्थावराश्चैव नद्यः सर्वे च पर्वताः ॥४६
शुष्काः पूर्वमनावृष्ट्या सूर्यैस्ते च प्रधूपिताः ।
तदा तु विवशाः सर्वे निर्दग्धाः सूर्यरश्मिभिः ॥४७
जङ्गमाः स्थावराश्चैव धर्माधर्मात्मकास्तु वै ।
दग्धदेहास्तदा ते तु धूतपापा युगांतरे ॥४८
ख्यातातपा विनिर्मुक्ताः शुभया चातिबंधया ।
ततस्ते ह्युपपद्यंते तुल्यरूपैर्जनैर्जनाः ॥४६
कल्पदाह के उपस्थित हो जाने पर उनके शिष्य होंगे। जो कि गन्धर्व आदि पिशाच-मानुष और ब्राह्मणादिक हैं ।४३। पशु-पक्षी-स्थावर और सरीसृप हैं। उस समय में पृथ्वी तल में निवास करने वाले उनके स्थित होने पर जो सहस्र किरणें हैं वे स्वयं ही विभावित हो जाया करती हैं। वे
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सहस्रों किरणें सात किरणें होकर एक-एक किरण एक-एक सूर्य हो जाता है ।४४-४५। वे सबसे उत्थित होते हुए तीनों लोकों को प्रदग्ध कर देते हैं। उस दाह में चर प्राणी-स्थावर अर्थात् अचर और सब नदियाँ तथा समस्त पर्वत दग्ध होते हैं ।४६। पहिले वृष्टि के अभाव से सभी शुष्क हो जाते हैं और सरसता नाम मात्र को भी कहीं पर नहीं रहती है। इसके पश्चात् वे सब उक्त सूर्यों से जो अतीव प्रखर हैं प्रधूपित होते हैं। उस काल से सभी विवश होकर निर्दग्ध हो जाते हैं और सूर्यों की किरण से जल भुन जाया करते हैं ।४७। जङ्गम और स्थावर जो भी धर्म और अधर्म के स्वरूप वाले हैं, उस समय में उन सके देह प्रदाध होते हैं और अन्ययुग में उनके पाप विनष्ट होकर वे निष्पाप एवं शुद्ध हो जाते हैं ।४८। शुभ अतिबन्ध से वे ख्यातातप विनिर्मुक्त हो जाते हैं। इसके उपरान्त वे जन सब तुल्य रूप वाले जनों के ही साथ में उपपन्न हो जाते हैं ।४९।
उषित्वा रजनीं तत्र ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
पुनः सर्गे भवंतीह मानसा ब्रह्मणः सुताः ॥५०॥
ततस्तेषूपपन्नेषु जनैस्त्रैलोक्यवासिषु ।
निर्दग्धेषु च लोकेषु तदा सूर्यैस्तु सप्तभिः ॥५१॥
वृष्ट्या क्षितौ प्लावितायां विजनेष्वर्णवेषु च ।
सामुद्राश्चैव मेघाश्च आपः सर्वाश्च पार्थिवाः ॥५२॥
शरमाणा व्रजंत्येव सलिलाख्यास्तथानुगाः ।
आगतागतिकं चैव यदा तत्सलिलं बहु ॥५३॥
संछाद्येमां स्थितां भूमिमर्णवाख्यं तदाभवत् ।
आभाति यस्मात् स्वाभासो भाशब्दो व्याप्तिदीप्तिषु ॥५४॥
सर्वतः समनुप्राप्त्या तासां चाम्भो विभाव्यते ।
तदंस्तनुते यस्मात्सर्वां पृथ्वीं समंततः ॥५५॥
धातुस्तनोति विस्तारे न चैतास्तनवः स्मृताः ।
शर इत्येष शीर्णे तु नानार्थो धातुरुच्यते ॥५६॥
फिर अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी की एक रात्रि तक वहाँ निवास करके फिर जब सृष्टि की रचना होती है उसमें वहाँ पर ब्रह्माजी के मानस
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७७
अर्थात् मन से ही समुत्पन्न पुत्र होते हैं ।५०। इसके अनन्तर जनों के साथ त्रैलोक्य के निवासी उनके उत्पन्न होने पर और उस समय में उन प्रखरतम सात सूर्यों के द्वारा समस्त लोकों के निर्दग्ध हो जाने पर ।५१। वृष्टि के धारा सम्पात से इस पृथ्वीतल के पूर्णतया प्लावित हो जाने पर, सब समुद्रों के विजन हो जाने पर सब समुद्र-मेघ और सम्पूर्ण जल और सब पार्थिव शीर्ण होते हुए सलिल के नाम पर अनुग होकर गमन किया करते हैं और आगतागतिक जिस समय में बहुत वह जल हो गया था ।५२-५३। उस समय में इस सम्पूर्ण भूमि को संच्छादित करके जो यहाँ पर स्थित थी सभी कुछ एक अर्णव नामधारी हो गया था । जिससे स्व से आभास होने वाला भी शब्द दीप्तियों में व्याप्ति आभास होती है ।५४। सभी ओर उनकी समनु-प्राप्ति से जल ही विभावित होता है । उसके अन्दर जिस कारण से सभी ओर से सम्पूर्ण पृथ्वी को विस्तृत करता है ।५५। विस्तार में धातु विस्तार किया करती है और ये तनु नहीं कहे गये हैं । शीर्ण होने पर शर यह नाना अर्थों वाला धातु कहा जाया करता है ।५६।
एकार्णवे भवन्त्यापो न शीघ्रास्तेन ते नराः । तस्मिन् युगसहस्रान्ते संस्थिते ब्रह्मणोऽहनि ॥५७ तावत्काले रजन्यां च वर्तंत्यां सलिलात्मना । ततस्तु सलिले तस्मिन्नष्टाग्नौ पृथ्वीतले ॥५८ प्रशांतवातेऽन्धकारे निरालोके समंततः । एतेनाधिष्ठितं हीदं ब्रह्मा स पुरुषः प्रभुः ॥५९ विभागमस्य लोकस्य प्रकर्तुं पुनरैच्छत् । एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ॥६० तदा भवति स ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् । सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णो जितेंद्रियः । इमं चोदाहरंत्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥६१ आपो नारास्तत्तनव इत्यर्था अनुशुश्रुम । आपूर्यमाणास्तत्रास्ते तेन नारायणः स्मृतः ॥६२ सहस्रशीर्षा सुमनाः सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रकृत् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिस्त्रयीमयोऽयं पुरुषो निरुच्यते ॥६३
७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एकमात्र अर्णव के होने पर आप शीघ्र नहीं है उससे वे नर हैं । उस एक सहस्र युगों के अन्त में जबकि ब्रह्माजी का दिन संस्थित होता है ।५७। उतने समय में सलिल के स्वरूप से रजनी के वर्तमान होने का अवसर रहता है । फिर उस जल मे इस पृथ्वी तल में अग्नि तल में अग्नि बिल्कुल नष्ट हो जाया करती है ।५८। उस समय में वायु एकदम प्रशान्त होती है और सभी ओर घोर अन्धकार रहता है तथा सभी ओर आलोक का अभाव रहता है । यह सब इसके ही द्वारा अधिष्ठित रहता है और ब्रह्माजी ही वह प्रभु पुरुष होते हैं ।५९। फिर उन्होंने इस लोक के विभाग करने की इच्छा की थी जिस समय में सभी जङ्गम और स्थावर विनष्ट होचुके थे और केवल एक ही अर्णव सभी ओर था ।६०। उस अवसर से वे ब्रह्माजी सहस्रों शिरों वाले और सहस्रों पादों वाले होते हैं । वे सहस्रों शिरों वाले पुरुष सुवर्ण के समान वर्ण वाले थे और सब इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले थे । भगवान् नारायण के प्रति यहाँ पर इस श्लोक का उदाहरण दिया करते हैं ।६१। आप (जल) जो उसके तनु है—यह अर्थ सुनते हैं । वहाँ पर वे आपूर्य माण हैं—इसलिए नारायण कहे गये हैं ।६२। सहस्र शीर्षों से संयुत सुन्दर मन वाले—सहस्र चरणों से युक्त—सहस्र चक्षु और मुखों वाले सहस्र कृत हैं । सहस्र बाहुओं वाले हैं—ऐसे प्रथम प्रजापति हैं । यह पुरुष त्रयी से परिपूर्ण है—ऐसा कहा जाता है ।६३।
आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता एको ह्यमूर्तः प्रथमस्तवसौ विराट् । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा संपद्यते वै मनसः परस्तात् ॥६४
कल्पादौ रजसोद्रिक्तो ब्रह्मा भूत्वाऽसृजत्प्रभुः । कल्पांते तमसोद्रिक्तः कालो भूत्वाग्रसत्पुनः ॥६५
स वै नारायणो भूत्वा सत्त्वोद्रिक्तो जलाशये । त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्ये संप्रवर्त्तते ॥६६
सृजति ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम् । एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ॥६७
चतुर्युगसहस्रान्ते सर्वतः स जलावृते । ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु स काशे च भवे स्वयम् ॥६८
कल्प प्रतिसन्धि वर्णनम् ] [ ७६
चतुर्विधाः प्रजाः सर्वा ब्रह्मशक्त्या तमोवृताः । पश्यन्ति तं महर्लोके कालं सुप्तं महर्षयः ॥६९॥ भृग्वादयो यथोद्दिष्टास्तस्मिन् काले महर्षयः । सत्यादयस्तथा त्वष्टौ कल्पे लीने महर्षयः । तदा विवर्त्यमानैस्तैर्महत्परिगतं पराम् ॥७०॥
आदित्य के समान वर्ण से युक्त—इस भुवन के रक्षक एक—अमूर्त अर्थात् मूर्ति से शून्य यह प्रथम विराट् हैं। हिरण्यगर्भ—महान् आत्मा वाला पुरुष मन से परे सम्पन्न होता है ।६४। कल्प के आदि में रजो गुण से उद्रिक्त होकर प्रभु ब्रह्मा ने सृजन किया था। कल्प का जब अवसान होता है तो उस समय में तमोगुण के उद्रेक से समन्वित काल होकर फिर इस सम्पूर्ण सृष्टि का ग्रसन किया था ।६५। वही फिर भगवान् सत्व के उद्रेक से युक्त नारायण होकर जलाशय में विराजमान रहते हैं। आपने आपको तीन स्वरूपों में विभक्त करके भगवान् तीनों लोकों में सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।६६। सृजन करते हैं—ग्रसन करते हैं और स्वयं ही तीन रूपों से वीक्षण करते हैं। उस समय में समस्त स्थावर और जङ्गम के नष्ट हो जाने पर जब एकमात्र अर्णव ही विद्यमान रहा करता है ।६७। एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ियों का जब अन्त होता है उस समय में वह सभी ओर जल से समा-वृत होते हैं। उस समय में नारायण नामक वह ब्रह्मा इससे सार में स्वयं प्रकाशित रहते हैं ।६८। सब चारों प्रकार की प्रजा ब्रह्मा की शक्ति से तम से आवृत होती है। महर्षिगण उसको महर्लोक में सोये हुए काल को देखते हैं ।६९। उस काल में यथोद्दिष्ट भृगु आदि महर्षिगण है। उस समय में उनके विवर्त्यमानों के द्वारा महत् परिगत होता है ।७०।
गत्यर्थादृषितेर्धातोर्नामिनिष्पत्तिरुच्यते । यस्मादृषति सत्त्वेन महत्तस्मान्महर्षयः ॥७१॥ महर्लोकस्थितैर्दृष्टः कालः सुप्तस्तदा च तैः । सत्त्वाद्याः सप्त ये त्वासन्कल्पेऽतीते महर्षयः ॥७२॥ एवं ब्रह्मा तासु तासु रजनीषु सहस्रशः । दृष्टवन्तस्तदानींताः कालं सुप्तं महर्षयः ॥७३॥
८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कल्पस्यादौ सुबहुला यस्मात्संस्थाश्चतुर्दश ।
कल्पयामास वै ब्रह्मा तस्मात्कल्पो निरुच्यते ॥७४
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः ।
व्यक्ताव्यक्तो महादेवस्यस्य सर्वमिदं जगत् ॥७५
इत्येष प्रतिसंबन्धः कीर्तितः कल्पयोर्द्वयोः ।
सांप्रतं हि तयोर्मध्ये प्रागवस्था बभूव ह ॥७६
कीर्तितस्तु समासेन पूर्वकल्पे यथातथम् ।
सांप्रतं संप्रवक्ष्यामि कल्पमेतं निबोधतः ॥७७
गति के अर्थ वाली ऋषिति धातु नाम की निष्पत्ति होती है—ऐसा कहा जाता है। जिससे ऋषिति के सत्व होने से उससे महत् है अतएव महर्षि होते हैं ॥७१॥ अहर्लोक में स्थित होते हुए उन्होंने उस समय में सोये हुए काल को देखा था। जो कल्प के व्यतीत होने पर सत्त्वादि सात महर्षि थे ॥७२॥ इस प्रकार से उन-उन सहस्रों रजनियों में उस समय में आनीत महर्षियों ने सुप्तकाल को देखा था ॥७३॥ कल्प के आदि में जिससे सुबहुल चौदह संस्था हैं। ब्रह्माजी ने क्योंकि कल्पन किया था इसी कारण से कल्प कहा जाता है ॥७४॥ कल्पों के आदि काल में पुनः पुनः वही समस्त भूतों का सृजन करने वाला है। महादेव व्यक्त है। इसका ही यह सम्पूर्ण जगत है ॥७५॥ वह दोनों कल्पों का प्रति सम्बन्ध कर दिया गया है। इस समय में उन दोनों के मध्य में पूर्व की अवस्था हुई थी ॥७६॥ पूर्व में होने वाले कल्प में ठीक-ठीक कह दिया गया है। इस समय में इस कल्प के विषय में बतलाऊँगा, उसको समझ लीजिए ॥७७॥
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॥ पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ॥
सूत उवाच—एवं प्रजासन्निवेशं श्रुत्वा वै शांशपायनिः ।
पप्रच्छ नियतं सूतं पृथिव्युदधिविस्तरम् ॥१
कति द्वीपा समुद्रा वा पर्वता वा कति स्मृताः ।
कियंति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः ॥२
महाभूतप्रमाणं च लोकालोकं तथैव च ।
पृथ्वी व्यायाम विस्तारः ] [ ८१
पर्यायं परिमाणं च गति चन्द्रार्कयोस्तथा । एतत्प्रब्रूहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थतः ॥३ सूत उवाच—हंत वोऽहं प्रवक्ष्यामि पृथिव्यायामविस्तरम् ॥४ संख्यां चैव समुद्राणां द्वीपानां चैव विस्तरम् । द्वीपभेदसहस्राणि सप्तस्वन्तर्गतानि च ॥५ न शक्यंते क्रमेणेह वक्तुं यैः सततं जगत् । सप्त द्वीपान्प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सहः ॥६ तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते । अचिंत्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—इस रीति से शांशपायनि ने प्रजा के सन्निवेश का श्रवण करके फिर उसने श्री सूतजी ने नियत रूप से पृथिवी और उदधि के विस्तार के विषय में पूछा था ।१। द्वीप कितने हैं, समुद्र अथवा पर्वत कितने बताये गये हैं ? कितने वर्ष हैं और उन वर्षों में नदियों कौन-कौन बतायी गयी हैं ? ।२। महाभूतों का क्या प्रमाण है तथा लोकालोक प्रमाण क्या है ? चन्द्र और सूर्य का पर्याय-परिमाण और गति क्या हैं ? हे भगवान् ! यह सब आप विस्तार पूर्वक यथार्थ रूप से हमको बतलाइए ।३। श्री सूतजी ने कहा—हर्ष की बात है, मैं आपके सामने पृथ्वी का आयाम और विस्तार बतलाऊँगा ।४। समुद्रों की संख्या और द्वीपों का विस्तार भी बतलाऊँगा । यों तो द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे भेद सात द्वीपों के सहस्रों भेद होते हैं किन्तु वे सभी भेद सात द्वीपो के ही अन्तर्गत है ।५। जिनके द्वारा निरन्तर यह जगत है वे सब क्रम से यहाँ पर नहीं बताये जा सकते हैं । मैं इस समय में तो आपके समक्ष में सात द्वीपो को ही बताऊँगा और उनके साथ चन्द्र-सूर्य और ग्रहों का वर्णन करूंगा ।६। मानव उनका प्रमाण तर्क के द्वारा कहा करते हैं । किन्तु निश्चित रूप से जो भाव चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं उनका तर्क के सहारे साधन कभी नहीं करना चाहिए ।७।
प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यं प्रचक्षते । नववर्षं प्रवक्ष्यामि जंबूद्वीपं यथातथम् ॥८
८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विस्तरान्मण्डलाच्चैव योजनैस्तन्निबोधत । शतमेकं सहस्राणां योजनाग्रात्समंततः ॥६ नानाजनपदाकीर्णः पुरैश्च विविधैश्शुभैः । सिद्धचारणसंकीर्णः पर्वतैरुपशोभितः ॥१० सर्वधातुनिबद्धश्च शिलाजालसमुद्भवैः । पर्वतप्रभवाभिश्च नदीभिः सर्वतस्ततः ॥११ जंबूद्वीपः पृथुः श्रीमान् सर्वतः पृथुमंडलः । नवभिश्चावृतः सर्वो भुवनैर्भूतभावनैः ॥१२ लवणेन समुद्रेण सर्वतः परिवारितः । जंबूद्वीपस्य विस्तारात् समेन तु समंततः ॥१३ प्रागायताः सुपर्वाणः षडिमे वर्षपर्वताः । अवगाढा ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ ॥१४
जो प्रकृतियों से परे हैं वही चिन्तन न करने के योग्य नहीं है—ऐसा कहते हैं। नौ वर्षों से समन्वित जम्बू द्वीप को यथार्थ रूप से बतलाऊँगा ।८। उसको विस्तार से और मण्डल से योजनों के द्वारा समझ लीजिए । योजनाग्र से सभी ओर एक सौ सहस्र है। यह अनेक जनपदों से घिरा हुआ है और विविध परम शुभ नगरों से समन्वित है । यह सिद्धगण और चारणों से समाकीर्ण है और अनेक पर्वतों से उपशोभित है ।६-१०। शिलाओं के समुदायों से समुत्पन्न समस्त धातुओं से निबद्ध यह द्वीप है । इसके सभी ओर अनेक नदियाँ हैं जो पर्वत से उद्भूत हुई हैं ।११। यह जम्बूद्वीप बहुत विशाल है । श्री सम्पन्न है तथा इसका मण्डल भी महान् है । भूतों के करने वाले नौ भुवनों से यह सम्पूर्ण समावृत है ।१२। इसके चारों ओर क्षार समुद्र है जिसका भी विस्तार जम्बू द्वीप के विस्तार के ही समान है ।१३। प्रागायत सुपर्वा ये छै वर्ष पर्वत हैं जो दोनों ओर पूर्व और पश्चिम समुद्रों से अवगाढ हैं ।१४।
हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान् । सर्वत्तुषु सुखश्चापि निषधः पर्वतो महान् ॥१५ चतुर्वर्णश्च सौवर्णो मेरुश्चारुतमः स्मृतः ।
पृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८३
द्वात्रिंशच्च सहस्राणि विस्तीर्णः स च मूर्द्धनि ॥१६ वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्रः समुच्छ्रितः । नानावर्णस्तु पार्श्वेषु प्रजापतिगुणान्वितः ॥१७ नाभिबंधनसंभूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । पूर्वतः श्वेतवर्णश्च ब्राह्मणस्तस्य तेन तत् ॥१८ पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णः स्वभावतः । तेनास्य क्षत्रभावस्तु मेरोर्नानार्थकारणात् ॥१९ पीतश्च दक्षिणेनासी तेन वैश्यत्वमिष्यते । भृंगपत्रनिभश्चापि पश्चिमेन समाचितः ॥२० तेनास्य शूद्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः । वृत्तः स्वभावतः प्रोक्तो वर्णतः परिमाणतः ॥२१
हिमवान् गिरि में प्रायः हिम समूह होता है और हेमकूट पर्वत हेम से संयुत है। निषध एक महान पर्वत है जो सभी ऋतुओं में सुखदायी होता है ।१५। मरु पर्वत चार वर्णों वाला है और सुवर्ण से युक्त है यह अधिक सुन्दर कहा गया है और मूर्धा में बत्तीस सहस्र योजनों के विस्तार वाला है ।१६। यह वृत्त आकृति और प्रमाण वाला है तथा चौकोर और समुच्छ्रित अर्थात् ऊँचा है। इसके पार्श्व भागों में अनेक वर्ण हैं तथा यह प्रजापति के गुणों से संयुत है ।१७। अव्यक्त जन्म वाले ब्रह्माजी के नाभिबन्धन से यह समुत्पन्न हुआ है। उसके पूर्व की ओर यह श्वेत वर्ण वाला है इससे ब्राह्मण है ।१८। उत्तर की ओर पार्श्वभाग उसका स्वभाव से ही रक्तवर्ण है। इस कारण से मेरु के अनेक अर्थ कारण से इसका क्षत्र भाव है ।१९। यह दक्षिण दिशा की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर पीत है इससे इसका वैश्यभाव अभीष्ट होता है। पश्चिम की ओर यह भृङ्गपत्र के सदृश समाचित है ।२०। इस कारण से इसका शूद्रभाव होता है—इस तरह से इसके चार वर्ण कहे गये हैं। यह स्वभाव से वृत्त कहा है और वर्ण तथा परिमाण से भी बताया गया है ।२१।
नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः । मयूरबर्हवर्णस्तु शातकौम्भश्च शृंगवान् ॥२२
८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः । तेषामंतरविष्कंभो नवसाहस्र उच्यते ॥२३ मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः । नवैकं तु सहस्राणि विस्तीर्णं सर्वतस्तु तत् ॥२४ मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः । वेद्यर्द्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्द्धं तथोत्तरम् ॥२५ वर्षाणि यानि षट् चैव तेषां ये वर्षपर्वताः । द्वे द्वे सहस्रे विस्तीर्णा योजनानां समुच्छ्रयात् ॥२६ जंबूद्वीपस्य विस्तारात्तेषामायाम उच्यते । योजनानां सहस्राणि शतं द्वावायतौ गिरी ॥२७ नीलश्च निषधश्चैव ताभ्यां हीनास्तु ये परे । श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्छृंगवांस्तथा ॥२८
नील—वैदूर्यमय—श्वेत—हिरण्मय—मोर के वर्हण के वर्ण वाला और शातकौम्भ तथा शृङ्गवान् है ।२२। ये सब पर्वतों के शिरोमणि राजा पर्वत हैं जो कि सिद्धों और चारणों के द्वारा सेवित रहा करते हैं अर्थात् इनमें सिद्ध और चारण निवास किया करते हैं । उनका अन्तर निष्कम्भ नौ सहस्र योजन कहा जाता है ।२३। मध्य में इलावृत नाम वाला गिरि है जो महामेरु के समंतस है । यह भी इसी प्रकार से नौ सहस्र ही सब ओर से विस्तार वाला है ।२४। इसके मध्य में महा है जो धूम से रहित अग्नि के समान देदीप्यमान है । मेरु के वेदी का अर्ध दक्षिण है तथा उत्तर अर्ध भाग उत्तर है ।२५। जो छै वर्ष हैं उनके जो वर्ष पर्वत हैं ऊँचाई से दो-दो सहस्र योजन विस्तीर्ण हैं ।२६। जम्बू द्वीप के विस्तार से उनका आयाम कहा जाता है । दो गिरि सौ सहस्र योजन आयत हैं ।२७। नील और निषध उन दोनों से जो दूसरे हैं वे हीन हैं । श्वेत—हेमकूट—हिमवान् तथा शृङ्गवान् हैं ।२८।
नवती द्वे अशीती द्वे सहस्राण्यायतास्तु तैः । तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै ॥२९ प्रपाताविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु ।
पृथ्वी व्यायाम विस्तरः ] [ ८५
संततानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम् ॥३० वसंति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः । इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम् ॥३१ हेमकूटं परं ह्यस्मान्नाम्ना किंपुरुषं स्मृतम् । नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते ॥३२ हरिवर्षात्परं चापि मेरोश्च तदिलावृतम् । इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम् ॥३३ रम्यकात्परतः श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्मयम् । हिरण्मयात्परं चैव शृंगवत्तः कुरु स्मृतम् ॥३४ धनुः संस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे । दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम् ॥३५
उनसे दो सहस्र नब्बे और दो सहस्र अस्सी आयत हैं। उनके मध्य में जनपद हैं जो सात वर्ष है ।२६। उन प्रपातों से विषम पर्वतों से जो हैं। निरन्तर बहने वाली नदियों के बहुत से भेदों से जो परस्पर में गमन करने के अयोग्य है ।३०। उनमें अनेक जातियों वाले जीव निवास करते हैं और सभी ओर जो वहाँ रहा करते हैं। यह हैमवत वर्ष है जो भारत—इस नाम से प्रसिद्ध है ।३१। इससे आगे हेमकूट है जो नाम से किम्पुरुष कहा गया है। हेमकूट से आगे नैषध है जो हरि वर्ष कहा जाया करता है ।३२। हरिवर्ष से परे मेरु का वह इलावृत है। इलावृत से आगे नील है जो रम्यक नाम से विख्यात है ।३३। रम्यक से आगे श्वेत है जो हिरण्मय नाम से विश्रुत है। हिरण्मय से आगे शृङ्गवत् हैं जो कुरु कहा गया है ।३४। दक्षिण और उत्तर दिशा में धनुःसंस्थ दो वर्ष जानने चाहिए। वहाँ पर चार दीर्घ हैं जो मध्यम है वह इलावृत है ।३५।
अर्वाक् च निषधस्याथ वेद्यद्धं दक्षिणं स्मृतम् । परं नीलवतो यच्च वेद्यद्धं तु तदुत्तरम् ॥३६ वेद्यर्द्धं दक्षिणे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्तरे । तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्मध्य इलावृतम् ॥३७ दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु ।