भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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लोककल्पनम् (२) ] [ ६५

रचना की गयी है ।१०६। वहाँ पर दश कल्पों तक स्थित होकर वे फिर सत्य को चले जाया करते हैं। वे लोक ब्रह्मलोक को जाते हैं जो कि गति अपरा-वर्त्तिनी होती है ।११०। विना आधिपत्य के वे निश्चय ही ऐश्वर्य के द्वारा उसके समान होते हैं। वे सभी स्वरूप से और विषय से ब्रह्मा के ही तुल्य होते हैं। वहाँ पर वे स्वयंग्रुत प्रीति से युक्त होते हुए अवस्थित रहा करते हैं । अवश्यम्भावी अर्थ मे वे प्राकृत को स्वयं विस्तृत किया करते हैं ।१११-११२।

नानात्वेनाभिसंबोध्यास्तदा तत्कालभाविताः ।
स्वतोऽबुद्धिपूर्वं हि बोधो भवति हौ यथा ।।११३
तत्कालभावितो तेषां तथा ज्ञानं प्रवर्त्तते ।
प्रत्याहारैस्तु भेदानां तेषां हि न तु शुष्मिणाम् ।।११४
तैश्च सार्धं प्रवर्त्तन्ते कार्याणि कारणानि च ।
नानात्वदर्शिनां तेषां ब्रह्मलोकनिवासिनाम् ।।११५
विनिवृत्तविकाराणां स्वेन धर्मेण तिष्ठताम् ।
तुल्यलक्षणसिद्धास्तु शुभात्मानो निरञ्जनाः ।।११५
प्राकृते करणोपेताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ।
प्रस्थापयित्वा चात्मानं प्रकृतिस्त्वेष तत्त्वतः ।।११७
पुरुषाण्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ।
प्रवर्त्तते पुनः सर्गस्तेषां साकारणात्मनाम् ।।११८
संयोगः प्रकृतिर्ज्ञेया युक्तानां तत्त्वदर्शिनाम् ।
तत्रोपवर्णिणी तेषामपुनर्भारगामिनाम् ।।११९

उस समय में उस काल से भावित होते हुए नानात्व से अभि संवध्य होते हैं। अबुद्धि पूर्वक शयन करते हुए जैसे ही निश्चित बोध होता है ।११३। उस काल से भावित होने पर उनको उस प्रकार का ज्ञान प्रवृत्त होता है। उन भेदों के प्रत्याहारों से ही होता, शुष्मियों का नहीं होता है ।११४। और उनके साथ ही कार्य तथा कारण प्रवृत्त हुआ करते हैं। नानात्व के दर्शी ब्रह्मलोक के निवासी उनका जो अपने धर्म से विशेष रूप से निवृत्त विकारों वाले हैं और स्थित हैं तुल्य लक्षण वाले सिद्ध-शुभात्मा और