भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

धर्मस्य कीर्त्यते सर्गः सात्त्विकस्तु सुखोदयः । तथाऽधर्मस्य हिंसायां तामसोऽशुभलक्षणः ॥६० भृग्वादीनामृषीणां च प्रजासर्गोपवर्णनम् । ब्रह्मर्षेश्च वसिष्ठस्य यत्र गोत्रानुकीर्त्तनम् ॥६१ अग्नेः प्रजायाः संभूतिः स्वाहायां यत्र कीर्त्यते । पितृ णां द्विपकाराणां स्वधायां तदनन्तरम् ॥६२ पितृवंशप्रसंगेन कीर्त्यते च महेश्वरात् । दक्षस्य शापः सत्यांश्च भृग्वादीनां च धीमताम् ॥६३

उसी प्रकार से ही शतरूपा में उन दोनों के पुत्र समुत्पन्न हुए थे । इसके आगे प्रियव्रत और उत्तानपाद हुए थे । प्रसूति की परम शुभ आकृतियां थीं ।५७। त्रिभुवन में जो प्रतिष्ठा से युक्त थे वे पापों से रहित थे—ऐसा ही कहा जाता है । प्रजापति से रुचि की और फिर आकूति में मिथुन से उत्पत्ति हुई थी ।५८। प्रजापति दक्ष की कन्याओं का प्रसूति में जन्म परम शुभ हुआ शब्दाद्य दाक्षायणीओं में भी महान् आत्मा वाले धर्म का उद्भव हुआ था ।५६। यह धर्म का जन्म परम सात्विक और सुख के उदय वाला सर्ग कहा जाता है । उसी भाँति हिंसा में अधर्म का उद्भव हुआ है जो तामस और अशुभ लक्षण वाला है ।६०। भृगु आदि ऋषियों की प्रजा के सर्ग का उप वर्णन है और जिसमें ब्रह्मर्षि वसिष्ठजी के गोत्र का अनुकीर्त्तन किया है ।६१। जिसमें स्वाहा नाम धारिणी स्वाहा पत्नी में अग्नि की सन्तति का वर्णन किया जाता है । इसके उपरान्त स्वधा नाम की पत्नी में दो प्रकार के पितृगणों का वर्णन किया जाता है ।६२। पितृगणों के वंश के प्रसङ्ग से भगवान् महेश्वर से और सती से दक्ष प्रजापति के लिए शाप का वर्णन है और परम बुद्धिमान भृगु आदि ऋषियों को जो प्रतिशाप दिया गया है उसका वर्णन होता है ।६३।

प्रतिशापश्च दक्षस्य रुद्रादद्भुतकर्मणः । प्रतिषेधश्च वैरस्य कीर्त्यते दोषदर्शनात् ॥६४ मन्वन्तरप्रसंगेन कालाख्यानं च कीर्त्यते । प्रजापतेः कर्द्दमस्य कन्यायाः शुभलक्षणम् ॥५६