संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृत्य-समुद्देश्य ] [ १३
तथा निर्वचनं प्रोक्तं कल्पस्य च परिग्रहः ।
नव सर्गा पुनः प्रोक्ता ब्रह्मणो बुद्धिपूर्वकाः ॥५३
त्रयो ये बुद्धिपूर्वास्तु तथा यल्लोककल्पनम् ।
ब्रह्मणोऽवयवेभ्यश्च धर्मादीनां समुद्भवः ॥५४
ये द्वादश प्रसूयंते प्रजाकल्पे पुनः पुनः ।
कल्पयोरंतरे प्रोक्तं प्रतिसंधिश्च यस्तयोः ॥५५
तमोमात्रा वृतत्वात्तु ब्रह्मणोऽधर्मसंभवः ।
सत्त्वोद्रिक्ताच्च देहाच्च पुरुषस्य च संभवः ॥५६
बहुत विस्तार से योजनों के संचरण का वर्णन स्वर्ग स्थान और विभाग जो कि शुभ समाचरण करने वाले मनुष्यों का है उसका वर्णन है ।५०। फिर वृक्षों की, औषधियों की, लताओं की सृष्टि का कीर्त्तन किया गया है । देवगणों और ऋषियों की दो प्रकार की उत्पत्ति बतलायी गयी है ।५१। आम्र आदि वृक्षों की सृष्टि तथा व्यञ्जन की सृजन और पुरुषों का एवं पशुओं का सृजन बताया गया है ।५२। उसी प्रकार से निर्वचन कहा गया है और कल्प का परिग्रहण किया है । इस प्रकार से ब्रह्मा के बुद्धि के साथ नौ सर्ग कहे गये हैं ।५३। जो ये तीन हैं वे बुद्धि से युक्त हैं और जो लोकों की कल्पना है ब्रह्मा के अवयवों से धर्म आदि की उत्पत्ति होती हैं ।५४। प्रजा के कल्प में जो द्वादश प्रसूत हुआ करते हैं और बार-बार उत्पन्न होते हैं जो उन दोनों की प्राप्ति सन्धि है वह कल्पों के अन्तर में कही गयी है ।५५। तमोगुण की मात्रा से समावृत होने से ब्रह्मा से अधर्म की उत्पत्ति हुआ करती है और सत्त्व के उद्रेक वाले देह से पुरुष की उत्पत्ति होती है ।५६।
तथैव शतरूपायां तयोः पुत्रास्ततः परम् ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूत्याकृतयः शुभाः ॥५७
कीर्त्यंते धूतपाप्मानस्त्रैलोक्ये ये प्रतिष्ठिताः ।
रुचेः प्रजापतेश्चोर्ध्व माकृत्यां मिथुनोद्भवः ॥५८
प्रसूत्यामपि दक्षस्य कन्यानामुद्भवः शुभः ।
दाक्षायणीषु वाप्यूर्ध्वं शब्दाद्यासु महात्मनः ॥५९