भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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चतुर्युगाख्यान वर्णनम् ] | १०५

हैं। उस युग में श्रुतियाँ और स्मृतियाँ दो प्रकारों को प्राप्त कर लिया करती हैं। श्रुति-स्मृतियों के दो प्रकार के स्वरूप हो जाने से किसी निश्चय का अधिगम नहीं हुआ करता है और अनिश्चय के अधिगम से धर्म का वास्त- विक तत्त्व नहीं रहता है ।६-७।

धर्मासत्वेन मित्राणां मतिभेदो भवेन्नृणाम् । परस्परविभिन्नैस्तैर्दृष्टीनां विभ्रमेण च ॥८ अयं धर्मो ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते । कारणानां च वैकल्यात्कार्याणां चाप्यनिश्चयात् ॥९ मतिभेदेन तेषां वै दृष्टीनां विभ्रमो भवेत् । ततो दृष्टिविभिन्नैस्तु कृतं शास्त्राकुलं त्विदम् ॥१० एको वेदश्चतुष्पाद्धि त्रेतास्विह विधीयते । संक्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु च ॥११ ऋषिमंत्रात्पुनर्भेदाद्भिद्यते दृष्टिविभ्रमैः । मंत्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥१२ संहिता ऋग्यजुः साम्नां संपठ्यंते महर्षिभिः । सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिन्ने क्वचित्क्वचित् ॥१३ ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मंत्रप्रवचनानि च । अन्येऽपि प्रस्थितास्तान्वै केचित्तान्प्रत्यवस्थिताः ॥१४

धार्मिकता के न रहने से भिन्न मनुष्यों की मति का भेद हो जाया करता है। वे सब आपस को भी किसी के साथ सहानुभूति नहीं होती है। सब की सृष्टि में विभ्रम हो जाया करता है ।८। यह धर्म है अथवा यह अधर्म है—इसका कोई भी निश्चय नहीं हुआ करता है। कारणों के विकल्प होने से और कार्यों के निश्चय नहीं होने से धर्माधर्म का कोई निश्चय नहीं हुआ करता है ।९। उन मनुष्यों की मति के विभेद होने से उनकी दृष्टियों का भी विभ्रम हो जाता है। फिर विभिन्न दृष्टियों वाले मनुष्यों के द्वारा शास्त्रों को भी आकुलित कर दिया था ।१०। वेद एक ही था उसको त्रेता- युग में चार पादों वाला किया जाता है। आयु के संक्षय होने से द्वापर युग में यह व्यवस्थित हो जाता है ।११। ऋषियों ने और मन्त्रों के फिर भेद