भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

होने से यह दृष्टि के विभ्रमों से युक्त हो जाता है । जिस से मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग का विन्यास होता है और स्वरों तथा वर्णों का विपर्यय होता है ।१२। महर्षियों के द्वारा ऋग्वेद-यजुर्वेद और सामवेद की संहितायें पढ़ी जाया करती हैं । कहीं पर सामान्य और कहीं-कहीं पर दृष्टि की भिन्नता होने पर वैकृत ये पढ़ी जाया है ।१३। ब्राह्मण-कल्प सूत्र और मन्त्र प्रवचन और अन्य भी प्रथित हैं और कुछ उनके प्रति अवस्थित हैं ।१४।

द्वापरेषु प्रवर्त्तन्ते निवर्त्तन्ते कलौ युगे ।
एकमाध्वर्यवं त्यासीत्पुनर्द्वैधमजायत ।।१५
सामान्यविपरीतार्थैः कृतशास्त्राकुलं त्विदम् ।
आध्वर्यवस्य प्रस्थानैर्बहुधा व्याकुलीकृतैः ।।१६
तथैवाथर्वऋक्सांम्नां विकल्पैश्चापि संज्ञया ।
व्याकुले द्वापरे नित्यं क्रियते भिन्नदर्शनैः ।।१७
तेषां भेदाः प्रतीभेदा विकल्पाश्चापि संख्यया ।
द्वापरे संप्रवर्त्तन्ते विनश्यन्ति ततः कलौ ।।१८
तेषां विपर्ययोत्पन्ना भवन्ति द्वापरे पुनः ।
अवृष्टिर्मरणं चैव तथैव व्याध्युपद्रवाः ।।१९
वाङ्मनः कर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते पुनः ।
निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ।।२०
विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम् ।
दोषदर्शनतश्चैव द्वापरेऽज्ञानसंभवः ।।२१

यह सब कुछ द्वापर युग में प्रवृत्त होते हैं और कलियुग में भी सभी भेद-प्रभेद निवृत्त हो जाते हैं । एक आध्वर्यव था और फिर दो प्रकार हो गये थे ।१५। साधारण और विपरीत अर्थों के द्वारा यह शास्त्र आकुल कर दिया गया था यह बहुधा आध्वर्यव के व्याकुली कृत प्रस्थानों के द्वारा ही हुआ था ।१६। तथा अर्थात् उसी प्रकार से संज्ञा के द्वारा अथर्व-ऋक् और सामों के विकल्पों से भी हुआ था । नित्य ही इस तरह से व्याकुल द्वापर में विभिन्न दर्शन शास्त्रों के द्वारा किया जाता है ।१७। संख्या से उनके भेद-प्रतीभेद-और विकल्प द्वापर युग में भली-भाँति प्रवृत्त होते हैं और फिर जब कलियुग आ जाता है तो सभी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१८। द्वापर में फिर

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