भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।२४। ये सभी द्वापर युग में मनुष्यों की बुद्धियों के भेद होने से अभिवर्तित हैं। मन से-वचन से और कर्म से बड़ी कठिनाई से वार्त्ता प्रसिद्ध होती है ।२५। द्वापर में समस्त प्राणियों के कार्य शारीरिक क्लेश के साथ ही होते हैं। सबकी वृत्ति होती है जैसी कि वणिजों की हुआ करती हैं और किसी को भी तत्वों का निश्चय नहीं होता है ।२६। लोग स्वयं ही वेदों और शास्त्रों का प्रणयन किया करते हैं और धर्म सब मिलकर एकमेक जाते हैं और धर्मों की सङ्करता हो जाती है। चारों वर्णों और चारों आश्रमों का पूर्णतया विध्वंस हो जाता है और प्राणियों में प्रायः काम और क्रोध उत्पन्न हो जाया करते हैं ।२७। द्वापर युग में लोगों के मनों में राग-लोभ और वध करने की भावनायें उत्पन्न हो जाया करती है। द्वापर के आदि में व्यासदेव जी ने वेद के चार भाग किये थे ।२८।

निःशेषे द्वापरे तस्मिंस्तस्य संध्या तु यादृशी । प्रतिष्ठितगुणैर्हीनो धर्मोऽसौ द्वापरस्य तु ॥२९ तथैव संध्या पादेन ह्यङ्गः संध्या इतीष्यते । द्वापरस्यावशेषेण तिष्यस्य तु निबोधत ॥३० द्वापरस्यांशषेण प्रतिपत्तिः कलेरपि । हिंसासूयानृतं माया वधश्चैव तपस्विनाम् ॥३१ एते स्वभावास्तिष्यस्य साधयंति च वै प्रजाः । एष धर्मः कृतः कृत्स्नो धर्मश्च परिहीयते ॥३२ मनसा कर्मणा स्तुत्या वार्त्ता सिध्यति वा न वा । कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयानि च ॥३३ अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः । न प्रमाणं स्मृतेरस्ति तिष्ये लोकेषु वै युगे ॥३४ गर्भस्थो म्रियते कश्चिद्यौवनस्थस्तथापरः । स्थविराः केऽपि कौमारे म्रियन्ते वै कलौ प्रजाः ॥३५

द्वापरयुग के निःशेष होने पर उसकी सन्ध्या का काल भी जैसा ही था। द्वापर का यह धर्म गुणों से हीन प्रतिष्ठित होता है ।२९। उसी भाँति की पाद से सन्ध्या होती है। अङ्ग-ही सन्ध्या अभीष्ट हुआ करती है। द्वापर