भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 105

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ १०६

के अवशेष से अब तिष्य के विषय में समझ लो ।३०। जब द्वापर युग का अंश शेष रहता है तभी कलियुग की भी प्रतिपत्ति हो जाया करती है। जो तपश्चर्या का समाचरण करने वाले हैं उनमें भी युग के प्रभाव से हिंसा—असूया—अनृत—माया और वध की भावनायें उत्पन्न हो जाती हैं ।३१। ये तिष्य (कलि) के स्वभाव हैं जिनका साधन प्रजा के जन किया करते हैं। यह ही किया गया पूर्ण धर्म है और वास्तविक जो भी धर्म है वह परिहीण हो जाया करता है ।३२। मन से-कर्म से और स्तुति से वार्त्ता सिद्ध होती है अथवा नहीं होती है। कलियुग में रोग प्रकृष्ट रूप से मारक होता है और क्षुधा तथा भय होते हैं ।३३। कलि में वृष्टि के समय पर न होने को घोर भय होता है तथा देशों का विपर्यय हो जाता है। कलियुग में लोगों में स्मृति का कोई भी प्रमाण नहीं माना जाता है। कोई तो माता के गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, कोई युवावस्था में ही मर जाया करता है, कोई-कोई वृद्ध होकर मर जाते हैं। इस कलियुग में प्रजाजन कुमारावस्था में ही परलोक में चले जाया करते हैं ।३४-३५।

दुरिष्टैर्दु रधीतै श्च दुष्कृतैश्च दुरागमैः ।
विप्राणां कर्मदोषैस्तैः प्रजानां जायते भयम् ॥३६
हिंसा माया तथेष्र्या च क्रोधोऽसूयाक्षमा नृषु ।
तिष्ये भवन्ति जंतूना रोगा लोभश्च सर्वशः ॥३७
संक्षोभो जायतेऽत्यर्थं कलिमासाद्य वै युगम् ।
पूर्णे वर्षसहस्रे वै परमायुस्तदा नृणाम् ॥३८
नाधीयंते तदा वेदान्न यजंते द्विजातयः ।
उत्सीदंति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात् ॥३९
शूद्राणामंत्ययोनेस्तु संबंधा ब्राह्मणैः सह ।
भवंतीह कलौ तस्मिञ्छयनासनभोजनेः ॥४०
राजानः शूद्रभूयिष्ठाः पाखंडानां प्रवर्त्तकाः ।
गुणहीनाः प्रजाश्चैव तदा वै संप्रवर्त्तते ॥४१
आयुर्मेधा बलं रूपं कुलं चैव प्रणश्यति ।
शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः ॥४२

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