संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें११० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
बुरे मनोरथ-असद् विषयों का अध्ययन-बुरे पाप कर्म-बुरे शास्त्र और प्रजाओं के कुत्सित कर्मों के दोषों से ही भय उत्पन्न हो जाया करता है ।३६। हिंसा-माया-ईर्ष्या-क्रोध-निन्दा और अक्षमा-राग और सब प्रकार लोभ कलियुग में जन्तुओं में और मनुष्यों में होते हैं ।३७। अत्यधिक संक्षोभ कलियुग के प्राप्त होने पर समुत्पन्न हो जाता है । उस समय में मानवों की परमायु पूरे सहस्र वर्ष की होती है ।३८। उस समय में द्विजातिगण वेदों का अध्ययन नहीं किया करते हैं और न वे यजन ही किया करते हैं । सभी नर-क्षत्रिय और वैश्य क्रम से उत्पन्न हो जाया करते हैं ।३६। शूद्रों के ब्राह्मणों साथ अन्त्यजों से सम्बन्ध होते हैं और उस कलियुग में शय-आसर और भोजन का सब परस्पर में सम्बन्ध किया करते हैं ।४०। राजाओं में बहुधा शूद्र वर्ण वालों की अधिकता होती है जो कि पाखण्डों के प्रवर्त्तक ही हुआ करते हैं । उस समय में प्रजाजनों में भी गुणों की हीनता संप्रवृत होती है ।४१। न तो मानवों में मेधा होती है और न उनकी कुछ आयु ही होती है । बल-रूप और कुल सभी विनष्ट हो जाया करते हैं । जो शूद्र वर्ण वाले मानव हैं उनके आचार तो ब्राह्मणों के समान होते हैं और ब्राह्मण शूद्रों के तुल्य आचरण किया करते हैं ।४२।
राजवृत्ताः स्थिताश्चोराश्चोराचाराश्च पार्थिवाः । भृत्या एते ह्यसुभृतो युगांते समवस्थिते ॥४३
अशीलिन्योऽनृताश्चैव स्त्रियो मद्यामिषप्रियाः । मायाविन्यो भविष्यंति युगांते मुनिसत्तम ॥४४
एकपत्न्यो न शिष्यंति युगांते मुनिसत्तम । श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव ह्युपक्षयः ॥४५
साधूनां विनिवृत्तिश्च विद्यास्तस्मिन्युगक्षये । तदा धर्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान् ॥४६
चातुराश्रमशैथिल्यो धर्मः प्रविचरिष्यति । तदा ह्यल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला ॥४७
न रक्षितारो भोक्तरो बलिभागस्य पार्थिवाः । युगान्ते च भविष्यंति स्वरक्षणपरायणाः ॥४८