भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

चतुर्युगाख्यानवर्णनम् । [ १११

अरक्षितारो राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः । शूद्राभिवादिनः सर्वे युगान्ते द्विजसत्तमाः ॥४६

चौर्यं कर्म करने वाले पुरुष राजाओं के समान आचरण वाले हैं और जो पार्थिव हैं वे चोरों के समान आचरण करने वाले हैं। इस युग के अन्त समय के उपस्थित होने पर भृत्यगण प्राणों का भरण करने वाले हैं ।४३। नारियां शील से शून्य-मिथ्याचार वाली तथा मदिरा और मांस से प्रेम करने वाली होती हैं। हे मुनि श्रेष्ठ ! इस युग के अन्त में सभी स्त्रियां माया रचने वाली होती हैं ।४४। पुरुष भी एक ही पत्नी रखने के व्रत वाले नहीं होते हैं । हे मुनिसत्तम ! युग के अन्त समय में सर्वत्र ऐसा ही दिखलाई देता है । सब जगह अन्य पशुओं की प्रबलता होती है और गौओं के कुल का क्षय होता है ।४५। उस युग के क्षय में साधुजनों की विशेष रूप से निवृत्ति होती है। ऐसा ही जान लेना चाहिए। उस समय में अपने आपको बहुत ऊंचा उठाना ही धर्म है और दान के मूल वाला धर्म परम दुर्लभ होता है ।४६। ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य-वानप्रस्थ और संस्थान—इन चारों आश्रमों की शिथिलता वाला धर्म ही सब जगह चलेगा । उस समय में भूमि भी अल्प फल देने वाली होती है और कहीं पर महान् फल वाली होगी ।४७। राजा लोग केवल अपनी बलि का भोग करने वाले होंगे और प्रजा की रक्षा करने वाले नहीं होंगे । और युग के अन्त में ये नृपगण अपनी ही रक्षा करने में तत्पर रहा करेंगे । राजा लोग संरक्षण नहीं करने वाले और विप्रगण शूद्रों से उपजीविका चलाने वाले हो जायेंगे । और युग के अन्त में श्रेष्ठ द्विजगण भी शूद्रों के अभिवादन करने वाले हो जायेंगे ।४८-४६।

अट्टशूला जनपदाः शिवशूला द्विजास्तथा ।
प्रमदाः केशशूलाश्च युगान्ते समुपस्थिते ॥५०
तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः ।
यतयश्च भविष्यंति बहवोऽस्मिन्कलौ युगे ॥५१
चित्रवर्षी यदा देवस्तदा प्राहुर्युगक्षयम् ।
सर्वे वाणिजकाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे ॥५२
भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।
कुशीलचर्यापाखंडैर्व्याधिरूपैः समावृतम् ॥५३

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