भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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११२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पुरुषालपं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते । बाहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम् ॥५४ अव्याकर्त्ता क्रूरवाक्या नार्जवो नानसूयकः । न कृतो प्रतिकर्त्ता च युगे क्षीणे भविष्यति ॥५५ अशंका चैव पतिते युगान्ते तस्य लक्षणम् । ततः शून्या वसुमती भविष्यति वसुन्धरा ॥५६

सभी जनपद अट्टालिकाओं के शूल वाले हैं और शिव के शूल वाले सब द्विजातिगण हैं। इस युगान्त से समुपस्थित होने पर सभी प्रमदायें केशों के शूल वाली हैं ।५०। श्रेष्ठ द्विज भी अपनी तपस्या और यज्ञों के फल को द्रव्य लेकर बेच देने वाले हो जायेंगे । इस कलियुग में काषाय वस्त्रों के धारण करने वाले बहुत से यतिगण हो जायेंगे ।५१। जिस समय में विचित्र ढङ्ग से इन्द्रदेव वर्षा करने वाले हो जायेंगे उस समय में इस युग की क्षय कहते हैं । इस आधार युग में सभी वर्णों के मानव वाणिज्य व्यवसाय करने वाले हो जायेंगे ।५२। मनुष्य कूटमानों के द्वारा अधिक पण्य वस्तुओं का विक्रय किया करते हैं वह पण्य कुशील चर्या-पाखण्ड-ईर्ष्या और अन्यों से समावृत होगा ।५३। पुरुष के रूप से युक्त मनुष्य बहुत स्त्रियों वाला इस युग के अन्त के उपस्थित होने पर होंगे । लोग परस्पर में बहुत याचना करने वाले होंगे ।५४। इस युग के क्षीण होने पर मनुष्य प्रायः अव्याकर्त्ता-क्रूर वाक्य बोलने वाला-कुटिल-निन्दक और किए हुए उपकार का प्रत्युपकार न करने वाला होगा ।५५। इस युग के अन्त में यही उसका लक्षण है कि पतित में कोई भी शंका नहीं होती है अर्थात् निश्शङ्क होकर पतित व्यक्ति से सम्बन्ध स्थापित रक्खा करते हैं। इसके पश्चात् यह वसुमती वसुन्धरा शून्य हो जायगी ।५६।

गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः प्रभविष्यंति शासकाः । हर्त्तारः पररत्नानां परदारविमर्शकाः ॥५७ कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसाप्रियाः । प्रनष्टचेतना धूर्त्ता मुक्तकेशास्त्ववैशूलिनः ॥५८ ऊनषोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये । शुक्लदंता जिताक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः ॥५९