भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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चतुर्युगाख्यानवर्णनम् ] [ ११३

शूद्रा धर्मं चरिष्यंति युगान्तो समुपस्थिते ।
सस्यचोरा भविष्यंति तथा चैलापहारिणः ॥६०
चोराच्चोराश्च हर्त्तारो हर्तुर्हर्त्ता तथापरः ।
ज्ञानकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते ॥६१
कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यंति मानवान् ।
अभीक्ष्णं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तथा ॥६२
कौशिकान्प्रतिवत्स्यंति देशाः क्षुद्भयपीडिताः ।
दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा ॥६३

जो रक्षक हैं वे भी रक्षा नहीं करने वाले शासक हो जायेंगे । ये दूसरों के रत्नों का हरण करने वाले तथा दूसरों की स्त्रियों से विमर्श करने वाले हो जायेंगे ।५७। सभी लोग काम वासना से परिपूर्ण—दुष्ट भावों वाले—बहुत अशूम और दुस्साहस से प्रेम करने वाले—नष्ट चेष्टा वाले—धूर्त्त—अमृली केशों को खुले हुए रखने वाले होंगे ।५८। इस युग के क्षय में सोलह वर्ष से भी छोटी उम्र वाले सन्तान का प्रजानन किया करते हैं। शुक्ल दन्तों वाले—जिताक्ष—मुण्डित शिर वाले और काषाय रङ्ग के वस्त्रों के धारण करने वाले होंगे ।५९। युगान्त के उपस्थित होने पर शूद्र लोग धर्म का आचरण करेंगे । लोग धान तथा फसल की चोरी करने वाले और वस्त्रों का अपहरण करने वाले होंगे ।६०। चोर से हरण करने वाले चोर तथा हरणकर्त्ता से दूसरे हरण करने वाले हो जायेंगे । ज्ञान पूर्वक कर्मों के उपरत हो जाने पर समस्त लोक निष्क्रियता को प्राप्त हो जायगा ।६१। कीड़े-मूषक और सर्प मानवों को प्रधर्षित करेंगे । उसी प्रकार से बराबर क्षेम कुशल-आरोग्य और सामर्थ्य सभी बहुत दुर्लभ हो जायेंगे । भूख के भय से पीड़ित मनुष्यों के देश कौशिकों को प्रति वास दिया करेंगे । इस प्रकार से दुःखों से जब मनुष्य पूर्ण रूप से अभिप्लुत होंगे तो उनकी उस समय से परमायु सौ वर्ष की ही रह जायगी ।६२-६३।

दृश्यंते च न दृश्यंते वेदा कलियुगेऽखिलाः ।
तत्सीदन्तो तथा यज्ञाः केवलाधर्मपीडिताः ॥६४
वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणोऽपरे ॥६५

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