संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाखण्डाः परिपंथिनः । उत्पद्यंते तदा ते वै संप्राप्ते तु कलौ युगे ॥६६ अधीयंते तदा वेदाञ्छूद्रा धर्मार्थकोविदाः । यजंते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः ॥६७ स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वान्ये च परस्परम् । अपहृत्य तथाऽन्योन्यं साधयंति तदा प्रजाः ॥६८ दुःखप्रवचनाल्पायुर्देहाल्पायुश्च रोगतः । अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम् ॥६६ प्रजासु भ्रूणहत्या च तदा वैरात्प्रवर्त्तते । तस्मादायुर्बलं रूपं कलि प्राप्य प्रहीयते ॥७०
इस कलियुग मैं समस्त वेद दिखलाई दिया करते हैं अथवा नहीं दिखाई देते हैं। उसी प्रकार से इसलिए यज्ञ अधर्म से पीड़ित होकर दुःखित होते हैं।६४। इस घोर कलियुग के सम्प्राप्त होने पर इस जगती तल में कषाय वर्ण को वस्त्र धारण करने वाले संन्यासी के वेषधारी—निग्रन्थ तथा कापालक लोग बहुत दिखाई दिया करते हैं। कुछ अन्य वेदों का विक्रय करने वाले हैं अर्थात् धन लेकर वेद के मन्त्रों को पढ़ने वाले हैं और दूसरे तीर्थों को बेचने वाले हैं और अन्य लोग ऐसे हैं जो वर्णों और आश्रमों का कोश पाखण्ड दिखाया करते हैं और वास्तव में इन वर्णाश्रमों के विरोधी शत्रु होते हैं। ऐसे ही लोग बहुधा उत्पन्न हो जाता करते हैं।६५-६६। धर्म के अर्थ के पण्डित बनने वाले शूद्र लोग उस समय में वेदों का अध्ययन किया करते हैं जिनको वेदों के पढ़ने का शास्त्रानुसार कभी भी अधिकार नहीं होता है। शूद्र योनि वाले अश्वमेध यज्ञ का यजन किया करते हैं।६७। वह ऐसा महान् घोर समय होगा कि उसमें स्त्रियों का—गौओं का और छोटे-छोटे निरीह बालकों का वध करके और आपस में ही एक दूसरे का वध दूसरे लोग किया करते हैं तथा पारस्परिक वध करके ही प्रजा का साधन किया करते हैं।६८। दुःखों के तथा मिथ्या प्रवचनों के होने से अल्प आयु हो जाती है और रोगों के कारण भी उम्र छोटी हो जाया करती है। सबके हृदयों में अधर्म का ही विशेष अभिनिवेश होने से इस कलियुग में सर्वत्र तमोगुण का ही बोलबाला रहेगा ऐसा बताया गया है।६६। उस समय