भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सभी ओर विविध प्रकार की वायु से यह वीज्यमान है अर्थात् जहां पर नाना भाँति की वायु सर्वत्र वहन किया करती है । इस रीति से अनेक प्रकार के गुणों से यह आश्रम समन्वित है । ऐसे आश्रम को जो बहुत ही उत्तम है उस राम ने देखा था ॥५०॥ जिस तरह कोई सुकृत करने वाला पुरुष स्वर्ग में प्रवेश किया करता है उसी तरह से परम विनीत उस राम ने वहाँ पर आश्रम में प्रवेश किया था । उस आश्रम के उपान्त में प्रवेश करके राम ने अपने प्रपितामह का दर्शन प्राप्त किया था ॥५१॥ हे राजन् ! वे प्रपितामह सैकड़ों ही मुनियों और शिष्यों से चारों ओर घिरे हुए थे । वे व्याख्यान करने की जो वेदिका थी उसके मध्य में एक कुशा के आसन पर विराजमान थे । उनके श्मश्रु-जटा और कूर्च (दाढ़ी) एकदम सफेद थे तथा ब्रह्मसूत्र से उपशोभित थे ॥५२॥ वामजंघा और जानु से दक्षिण ऊरु से वे अध्यस्त थे ॥५३॥ योग पट्ट से संवीत अपने देह वाले वे ऋषियों में परम श्रेष्ठ थे तथा व्याख्यान करने की मुद्रा से शोभित सव्य करकमल वाले थे ॥५४॥ योग पट्ट के ऊपर रक्खे हुए परम शोभित वाम कर वाले और भली भाँति आरण्यक उपनिषद् के वाक्यों के सूक्ष्म तत्व के अर्थ की संहृति का विशेष विवरण कर रहे थे ॥५५॥ और उनका विवरण करके वे तपोनिधि मुख्य मुनियों को श्रवण करा रहे थे । राम ने पितामह का दर्शन किया था ॥५६॥

शनैरिव महाराजसमीपं समुपागमत् ।
तमागतमुपालक्ष्य तत्प्रभावप्रधर्षिताः ॥५७
शंकामवापुर्मुनयो दूहादेवाखिलं नृप ।
तावद्भृगुरमेयात्मा तदागमनतोषितः ॥५८
निवृत्तान्यकथालापस्तं पश्यन्नास पार्थिव ।
रामोऽपि तमुपागम्य विनयावनताननः ॥५९
अवंदत यथान्यायमुपेन्द्र इव वेधसम् ।
अभिवाद्य यथान्यायं ख्यातिं च विनयान्वितः ॥६०
तांश्च संभावयामास मुनीन्द्रामो यथावयः ।
तैश्च सर्वैर्मुदोपेतैराशीर्भिरभिवर्द्धितः ॥६१
उपाविवेश मेधावी भूमौ तेषामनुज्ञया ।
उपविष्टं ततो राममाशीर्भिरभिनंदितम् ॥६२