संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का संवाद ] [ १३३
पप्रच्छ कुशलं प्रश्नं तमालोक्य भृगुस्तदा ।
कुशलं खलु ते वत्स पित्रोश्च किमनामयम् ॥६३
हे महाराज ! फिर वह राम उन महान् आत्मा वाले के समीप में धीरे से प्राप्त हुआ था। उसको समागत हुआ देखकर वहाँ पर जो भी स्थित थे वे सभी राम के प्रबल प्रभाव से धर्षित हो गये थे ।५७। हे नृप ! समस्त मुनिगण दूर से ही शङ्का को प्राप्त हो गये थे तब तक अमेय आत्मा वाले भृगु उसके आगमन से तोषित हुए थे ।५८। हे पार्थिव ! उसको देखते हुए ही अन्य कथा की बात चीत को उन्होंने बन्द कर दिया था। राम भी उनके समीप में पहुँचकर विनय से विनम्र मुख कमल वाला हो गया था ।५६। जिस प्रकार से उपेन्द्र ब्रह्माजी की वन्दना किया करते हैं ठीक उसी तरह से न्याय पूर्वक राम ने उनकी वन्दना की थी। विनम्रता समन्वित राम ने न्याय पूर्वक सबका अभिवादन किया था ।६०। राम ने समस्त मुनियों को अवस्था के अनुसार क्रम से सम्भावित किया था। और उन सब मुनियों ने भी आनन्द से समन्वित होकर आशीर्वादों के द्वारा उस रामको परिवर्धित किया था ।६१। वह परम मेधा से सुसम्पन्न राम भी उन सबकी अनुज्ञा से भूमि पर समीप में बैठ गया था। फिर जब बैठ गया तो सबने राम को आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया था ।६२। उस समय में भृगु ने उस राम का अवलोकन करके उससे कुशल प्रश्न पूछा था कि हे वत्स ! तुम्हारा कुशल तो है और तुम्हारे माता-पिता-पिता का स्वास्थ्य सुखमय है ।६३।
भ्रातॄणां चैव भवतः पितुः पित्रोस्तथैव च ।
किमर्थमागतोऽत्र त्वमधुना मम सन्निधिम् ॥६४
केनापि वा त्वमादिष्टः स्वयमेवाथवागतः ।
ततो रामो यथान्यायं तस्मै सर्वमशेषतः ॥६५
कथयामास यत्पृष्टं तदा तेन महात्मना ।
पितुर्मातुश्च वृत्तांतं भ्रातॄणां च महात्मनाम् ॥६६
पितुः पित्रोश्च कौशल्यं दर्शनं च तयोर्नृप ।
एतदन्यच्च सकलं भृगोः सप्रश्रयं मुदा ॥६७
न्यवेदयद्यथान्यायमात्मनश्च समीहितम् ।
श्रुत्वैतदखिलं राजन्रामेण समुदीरितम् ॥६८