भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तं च दृष्ट्वा विशेषेण भृगुः प्रीतोऽभ्यनन्दत । एवं तस्य प्रियं कुर्वन्नुत्कृष्टैरात्मकर्मभिः ॥६९॥ तत्राश्रमेऽवसद्रामो दिनानि कतिचिन्नृप । ततः कदाचिदेकांते रामं मुनिवरोत्तमः ॥७०॥

तुम्हारे भाइयों का आपके पिता के माता-पिता का कुशल-मङ्गल तो है ? इस समय में तुम किस प्रयोजन के लिए यहाँ पर मेरे समीप में समागत हुए हो ? ।६४। क्या किसी ने तुम को यहाँ आने की आज्ञा दी है अथवा तुम स्वयं अपनी ही इच्छा से यहाँ पर आये ? इसके पश्चात् राम ने उनकी सेवा में न्यायपूर्वक सभी कुछ पूर्णतया निवेदित कर दिया था। उन महात्मा ने उस वक्त जो भी पूछा था वह सब कह दिया था जो भी कुछ पिता-माता का और महान् आत्मा वाले भाइयों का वृत्तान्त था ।६५-६६। हे नृप ! उन दोनों पिता के माता-पिता की कुशलता से दर्शन का होना-यह और आय भृगु का नम्रता के साथ आनन्द से सब बता दिया था। और अपना जो भी कुछ अभीष्ट था उसका निवेदन कर दिया था। हे राजन् ! राम के द्वारा वर्णित यह सब श्रवण करके और विशेष रूप से उसको देखकर भृगु बहुत ही प्रसन्न हुए थे और उसका अभिनन्दन किया था। इस तरह से अतीव उत्कृष्ट अपने कर्मों के द्वारा उसका प्रिय करते हुए राम ने वहाँ निवास किया था। हे नृप ! राम उस आश्रम में कुछ दिन तक रहा था। इसके उपरान्त मुनिवर ने राम को किसी समय में एकान्त में बुलाया था। ।६७-७०।

वत्सागच्छेति तं राजन्नुपाह्वयदुपह्वरे । सोऽभिगम्य तमासीनमभिवाद्य कृतांजलिः ॥७१॥ तस्थौ तत्पुरतो रामः सुप्रीतेनांतरात्मना । आशीर्भिरभिनंद्याथ भृगुस्तं प्रीतमानसः ॥७२॥ प्राह नाधिगताशंकं राममालोक्य सादरम् । शृणु वत्स वचो मह्यं यत्त्वां वक्ष्यामि सांप्रतम् ॥७३॥ हितार्थं सर्वलोकानां तव चास्माकमेव च । गच्छ पुत्र ममादेशाद्धिमवंतं महागिरिम् ॥७४॥

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २) · पृष्ठ 130, कुल 893 में से · BharatKosha