भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 131

परशुराम का संवाद ] [ १३५

अधुनैवाश्रमादस्मात्तपसे धृतमानसः । तत्र गत्वा महाभाग कृत्वाऽश्रमपदं शुभम् ॥७५ आराध्य महादेवं तपसा नियमेन च । प्रीतिमुत्पाद्य तस्य त्वं भक्त्यानन्यगयाचिरात् ॥७६ श्रेयो महदवाप्नोषि नात्र कार्या विचारणा । तरसा तव भक्त्या च प्रीतो भवति शङ्करः ॥७७

मुनि ने कहा था—हे वत्स ! उपह्वर में आओ । वह रामभी उन मुनि के समीप में जाकर अपने हाथ जोड़कर उनका उसने अभिवादन किया था ।७१। राम परम प्रसन्न आत्मा से उनके आगे स्थित हो गया था और प्रसन्न मन वाले भृगु ने आशीर्वादों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।७२। उसने न अधिगत अंश वाले राम को आदर के साथ देखकर कहा था। हे वत्स ! आप मेरा वचन श्रवण करो जो इस समय में मैं आपको कहूँगा ।७३। यह वचन समस्त लोकों के तुम्हारे और हमारे हित के लिये है। हे पुत्र ! मेरे आदेश से अब महान् पर्वत हिमवान् को चले जाओ ।७४। तपश्चर्या करने के लिये अपने मन में निश्चय करके इसी समय इस आश्रम से चले जाओ । हे महाभाग, वहाँ जाकर उस आश्रम के स्थान को शुभ बना दो ।७५। यहाँ पर तपस्या और नियम से महादेवजी की समाराधना करो । चिरकाल तक अनन्य भक्ति से आप उनकी प्रीति का समुत्पादन करो ।७६। इसके करने से आप महान् श्रेय की प्राप्ति करेंगे—इस विषय में लेशमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिए। शीघ्र ही आपकी भक्ति से भगवान् शङ्कर परम प्रसन्न हो जायेंगे ।७७।

करिष्यति च ते सर्वं मनसा यद्यदिच्छसि । तुष्टे तस्मिञ्जगन्नाथे शङ्करे भक्तवत्सले ॥७८ अस्त्रग्राममशेषं त्वं वृणु पुत्र यथेप्सितम् । त्वया हितार्थं देवानां करणीयं सुदुष्करम् ॥७९ विद्यतेऽभ्यधिकं कर्म शस्त्रसाध्यमनेकंशः । तस्मात्त्वं देवदेवेशं समाराधय शङ्करम् ॥८० भक्त्या परमया युक्तस्ततोऽभीष्टमवाप्स्यसि ॥८१