भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वे भगवान् शङ्कर तुम्हारा सभी कुछ कार्य पूर्ण कर देंगे जो-जो भी आप अपने मन में चाहेंगे। उन भक्तों पर प्यार करने वाले जगत् के स्वामी भगवान् शङ्कर के सन्तुष्ट हो जाने पर तुम को यह करना चाहिए ।७८। हे पुत्र ! जो भी तुम्हारा अभीप्सित हो वह समस्त अस्त्रों के समुदाय को आप उनसे वरदान में माँग लेना। तुमको समस्त देवों की भलाई के लिए इस परम दुष्कर कार्य को कर ही लेना चाहिए ।७९। शस्त्रों के द्वारा साधन करने के योग्य अनेक कर्म होते हैं और विशेष अधिक होते हैं। इस कारण से तुम देवों के भी आराध्य देव भगवान् शङ्कर की आराधना करो। परमाधिक भक्ति से जब तुम संयुत हो जाओगे तो तुम सम्पूर्ण अपना प्राप्त कर लोगे ।८०-८१।


परशुराम की तपश्चर्या

वसिष्ठ उवाच-इत्येवमुक्तो भृगुणा तथेत्युक्त वा प्रणम्य तम् ।
रामस्तेनाभ्यनुज्ञातश्चकार गमने मनः ॥१
भृगुं ख्यातिं च विधिवत्परिक्रम्य प्रणम्य च ।
परिष्वक्तस्तथा ताभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः ॥२
मुनींश्च तान्नमसकृत्य तैः सर्वैरनुमोदितः ।
निश्चयक्रमाश्चमात्तस्मात्तपसे कृतनिश्चयः ॥३
ततो गुरुनियोगेन तदुक्तेनैव वर्त्मना ।
हिमवंतं गिरिवरं ययौ रामो महामनाः ॥४
सोऽतीत्य विविधान्देशान्पर्वतान्सरितस्तथा ।
वनानि मुनिमुख्यानामावासांश्चात्यगाच्छनैः ॥५
तत्र तत्र विवासेषु मुनीनां निवसन्पथि ।
तीर्थेषु क्षेत्रमुख्येषु निवसन्वा ययौ शनैः ॥६
अतीत्य सुवहून्देशान्पश्यन्नपि मनोरमान् ।
आससादाचलश्रेष्ठं हिमवंतमनुत्तमम् ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भृगु मुनि के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर राम ने उनको प्रणाम किया था और