संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम की तपश्चर्या ] [ १३७
राम उनके द्वारा आज्ञा प्राप्त करके वहाँ पर गमन करने का मन वाला हो गया था ।१। भृगु के सुयश का गान कर तथा विधि पूर्वक उनकी परिक्रमा करते हुए प्रणाम करके राम ने प्रस्थान करने की तैयारी की थी । उन दोनों ने उसका परिष्वजन किया था और आशीर्वचनों से राम का अभिनन्दन किया था ।२। वहाँ पर जो भी मुनिगण थे उन सबके लिए राम ने प्रणाम किया था तथा वह उन सब के द्वारा वहाँ गमन करने के लिए अनुमोदन प्राप्त करने वाला हुआ था । फिर राम उस आश्रम के स्थल से तपश्चर्या करने के लिए मन में पूर्ण निश्चय वाला होकर निकल दिया था ।३। इसके अनन्तर गुरु देव के नियोग से और उनके द्वारा बताये हुए बताये हुए मार्ग से महान् मन वाले राम ने गिरियों में परम श्रेष्ठ हिमवान् को गमन किया था ।४। मार्ग में उसको अनेक देश—पर्व्वत—नदियाँ—वन और प्रमुख मुनियों के आवास-स्थल मिले थे । उन सबका उसने धीरे-धीरे अतिक्रमण किया था ।५। मार्ग में जहाँ-जहाँ पर मुनियों के निवास स्थलों में विश्राम करते हुए और जो मुख्य क्षेत्र थे तथा तीर्थ स्थल मिले थे उनमें निवास करते हुए धीरे-धीरे वह वहाँ पर चलते चला गया था ।५। मार्ग में अनेक देशों का अतिक्रमण करके और परम मनोरथ देशों का अवलोकन करते हुए अन्त में परमोत्तम और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान् पर वह पहुँच गया था ।७।
स गत्वा पर्व्वतवरं नानाद्रुमलतास्थितम् ।
ददर्श विपुलैः शृङ्गैरुलिखंतमिवांबरम् ॥८
नानाधातुविचित्रैश्च प्रदेशैरुपशोभितम् ।
रत्नौषधीभिरभितः स्फुरद्भिरभिशोभितम् ॥९
मरुत्संघट्टनावह्नीरसान्घ्रिपजन्मना ।
सानिलेनानलेनोच्चैर्दह्यमानं नवं क्वचित् ॥१०
क्वचिद्रविकरामर्शज्वलदकौपलाग्निभिः ।
द्रवद्धिमशिलाजातुजलशांतदवानलम् ॥११
स्फटिकांजनदुर्वर्णस्वर्णराशिप्रभाकरैः ।
स्फुरत्परस्परच्छायाशरैर्दीप्तवनं क्वचित् ॥१२
उपत्यकशिलापृष्ठबालातपनिषेविभिः ।
तुषारक्लिन्नसिद्धौघैरुद्भासितवनं क्वचित् ॥१३