संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
क्वचिदकॊ शुसंभिन्नश्चामीकरशिलाश्रितैः । यक्षौघैर्भासितोपांतं विशद्भिरिव पावकम् ॥१४
वह उस श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँच गया था जहां पर अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएं थीं । उसने वहाँ पर देखा था कि बहुत से ऐसे ऊँचे शिखर विद्यमान हैं जो मानों अम्बर का स्पर्श करके उस पर कुछ लिख रहे हों ।८। वहाँ पर अनेक ऐसे प्रदेश हैं जिनमें विचित्र प्रकार की बहुत सी धातुएं विद्यमान हैं और उनसे वह परम शोभा शाली हो रहा है । वहाँ अनेक प्रकार के रत्न तथा दिव्य ओषधियां हैं जो निरन्तर स्फुरण किया करते हैं और उनसे उसकी अद्भुत शोभा हो रही है ।९। कहीं पर वायु के संघटन से रगड़ खाये हुए शुष्क वृक्षों से समुत्पन्न और वायु के संयोग वाले अग्नि से कहीं पर वह दाह भी करने वाला दिखाई दे रहा था ।१०। कहीं पर सूर्य की किरणों के प्रखर स्पर्श से जलती हुई अर्कोप्लाग्नि से पिघले हुए हिम की शिलाओं के जल से वह दवानल एकदम शान्त हो गया है ।११। कहीं पर स्फटिक अञ्जन से बुरे वर्ण वाले स्वर्ण के समूह की प्रभा की किरणों के द्वारा स्फुरण करते हुए परस्पर में छाया शरों से प्रसिद्ध था ।१२। उपत्यकाओं की शिलाओं के पृष्ठ भाग पर बालातप का सेवन करने वाले तुषार से क्लिन्न सिद्धों के समुदाय से वह वह वन कहीं पर उद्भासित हो रहा था । किसी-किसी जगह पर सूर्य की किरणों से संभिन्न सुवर्ण की शिलाओं पर समाश्रय ग्रहण करने वाले यक्षों के समुदायों से पावक में प्रवेश करने वालों की तरह उसका उपान्त भासित हो रहा था ।१४।
दरीमुखविनिष्क्रांततरक्षूत्पतनाकुलः । मृगयूथार्त्तसन्नादैरापूरितगुहं क्वचित् ॥१५ युद्धद्यद्वराहशार्दूलयूथपेरितरेतरम् । प्रसभोन्मृष्टकांतोरुशिलातरुतटं क्वचित् ॥१६ कलभोन्मेषणाकृष्टकारिणीभिरनुद्रुतः । गवयैः खुरसंक्षुण्णशिलाप्रस्थतटं क्वचित् ॥१७ वासितार्थेऽभिसंवृद्धमदोन्मत्तमतंगजैः । युद्धद्यद्भिश्चूर्णितानेकगंडशैलवनं क्वचित् ॥१८ बृंहितश्रवणामर्षान्मातंगानभिधावताम् ।