भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की तपश्चर्या } [ १३६

सिंहानां चरणक्षुण्णनखभिन्नोपलं क्वचित् ॥१६
सहसा निपतत्सिंहनखनिर्भिन्नमस्तकः ।
गजैराक्रन्दनादेन पूर्यमाणं वनं क्वचित् ॥२०
अष्टपादबलाकृष्टकेसरा दारुणाप्रवैः ।
भेद्यमानाखिलशिलागंभीरकुहरं क्वचित् ॥२१

कहीं पर दरियों के मुख से निकले हुए तरक्षुओं के उत्पतन ऊपर की ओर (उछाल) से समाकुल मृगों के आत्त नादों से जिसकी गुहा समापूरित हो रही थी ।१५। किसी स्थल पर एक दूसरे से परस्पर में युद्ध करते हुए वराह और शार्दूलों के यूथपतियों के द्वारा बलात् उन्मृष्ट सुन्दर एवं विशाल शिला एवं तटके तरुवर जिसमें विद्यमान थे ।१६। कहीं पर कलभों के उन्मेषण से आकृष्ट हुई करिणियों के द्वारा भागे हुए गवयों के खुर से वहाँ के तट प्रस्थ संक्षुण्ण थे ।१७। किसी स्थान पर वासित अर्थ में विशेष बढ़े हुए मद से उन्मत्त गजों से जो कि परस्पर में युद्ध कर रहे थे गण्ड स्थलों के द्वारा अनेक शैल के वनों को वहाँ पर चूर्णित कर दिया था ।१८। कहीं पर हाथियों की ध्वनि के श्रवण से जो क्रोध हुआ उसके कारण गजों को खदेड़ते हुए सिंहों के चरणों के क्षुण्ण नखों से पाषाण भिन्न हो गये थे ।१६। कहीं पर वहाँ ऐसा स्थल था कि अचानक आक्रमण करने वाले सिंहों के नाखूनों से युक्त हाथियों के क्रन्दन की ध्वनि से सम्पूर्ण वन पूरित होरहा था ।२०। अष्टपादों के द्वारा बलपूर्वक जिनके केसर खींच लिए गये हैं उनके परम दारुण शब्द से कहीं कहीं पर पर्वत की गम्भीर गुफाएँ भी सब भेद्यमान थी ।२१।

संरब्धानेक शबरप्रसक्त ऋक्षयूथपैः ।
इतरेतरसंमर्द विप्रभग्नदृषत्क्वचित् ॥२२
गिरिकुंजेषु संक्रीडत्करिणीमद्विपं क्वचित् ।
करेणुमद्रबन्मत्तगजाकलितकाननम् ॥२३
स्वपत्सिंहमुखश्वासमरूत्पूर्णदरीशतम् ।
गहनेषु गुरुत्राससाशंकविहरन्मृगम् ॥२४
कंटकशिलष्टलांगूललोमत्रुटनकातरैः ।
क्रीडितं चमरीयूथैर्मदमंदविचारिभिः ॥२५