भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम परीक्षा ] [ १४३

परशुराम परीक्षा

तपस्विनं तदा राममेकाग्रमनसं भवे ।
रसस्यैकांतनिरतं नियतं शंसितव्रतम् ॥१
श्रुत्वा तमृषयः सर्वे तपोनिर्धूतकल्मषाः ।
ज्ञानकर्मवयोवृद्धा महांन्तः शंसितव्रताः ॥२
दिदृक्षवः समाजग्मुः कुतूहलसमन्विताः ।
ख्यापयंतस्तपः श्रेष्ठं तस्य राजन्महात्मनः ॥३
भृग्वत्रिक्रतुजाबालिवामदेवमृकंडवः ।
संभावयंतस्ते रामं मुनयो वृद्धसंमताः ॥४
आजग्मुराश्रमं तस्य रामस्य तपसस्तपः ।
दूरादेव महांत्तस्ते पुण्यक्षेत्रनिवासिनः ॥५
गरीयं सर्वलोकेषु तपोऽग्र्यं ज्ञानमेव च ।
प्रशस्यं तस्य ते सर्वे प्रययुः स्वं स्वमाश्रमम् ॥६
एवं प्रवर्त्तितस्तस्य रामस्य भगवाञ्छिवः ।
प्रसन्नचेता नितरां बभूव नृपसत्तम ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—उस समय में भगवान् शिव में एकाग्र मन वाले—एकान्त में एक निष्ठ होकर निरत रहने वाले—नियत और शंसित व्रत से युक्त उस तपस्वी राम का श्रवण करके तप से निर्धूत कल्मष वाले ऋषियों ने जो ज्ञान और कर्मों में वृद्ध महान् और शंसित व्रत वाले थे सभी दर्शन की इच्छा वाले हुए थे ।१-२। देखने की इच्छा से समन्वित वे सब कुतूहल वाले वहाँ पर आये थे । हे राजन् ! वे सब महान् आत्मा वाले उस राम के परम श्रेष्ठ तप का वर्णन करने वाले थे ।३। बड़े-बड़े मुनियों के द्वारा संमत भृगु—अत्रि—क्रतु—जाबालि-वामदेव और मृकण्डु सब उस राम की प्रशंसा करने वाले थे ।४। तपस्या का तपन करने वाले उस राम के आश्रम में सब समागत हुए थे । ये सब बहुत महान् और पुण्य क्षेत्र के निवास करने वाले बहुत ही दूर से वहाँ आये थे ।५। समस्त लोकों में यह तप बहुत बड़ा उत्तम है और ज्ञान भी है । इस रीति से उन सब ने उसके तप की प्रशंसा की थी और फिर वे सभी अपने-अपने आश्रम को चले गये थे ।६। हे नृपों