संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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में श्रेष्ठ ! इस प्रकार से तपश्चर्या में प्रवृत्त होते हुए राम के ऊपर भगवान् शिव बहुत ही प्रसन्न चित्त वाले हो गये थे ।७।
जिज्ञासुस्तस्य भगवान् भक्तिमात्मनि शङ्करः । मृगव्याधवपुर्भूत्वा ययौ राजंस्तदंतिकम् ॥८ भिन्नांजनचयप्रख्यो रक्तांतायतलोचनः । शरचापधरः प्रांशुर्वज्रसंहननो युवा ॥६ उत्तुंगहनुबाह्वंसः पिंगलश्मश्रुमूद्धर्जः । तांसविस्रवसागंधी सर्वप्राणिविहिंसकः ॥१० सकंटकुलतास्पर्शक्षतारूषितविग्रहः । सासृक्संचर्व्वमाणश्च मांसखंडमनेकणः ॥११ मांसभारद्वयालंविविधानानतकंधरः । आरुजंस्तर सा वृक्षानूरुवेगेन संघशः ॥१२ अभ्यवर्त्तत तं देशं पादचारीव पर्वतः । आसाद्य सरसस्तस्य तीरं कुसुमितद्रुमम् ॥१३ न्यदधान्मांसभारं च स मूले कस्यचित्तरोः । निषसाद क्षणं तत्र तरुच्छायामुपाश्रितः ॥१४
हे राजन् ! भगवान् शंकर आत्मा में उसकी भक्ति के विषय में जानने की इच्छा वाले होकर पशुओं के व्याध का रूप धारण करके उस राम के समीप में गये थे ।८। तब व्याध के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—वह पिसे हुए अञ्जन के ढेर के समान कृष्ण वर्ण वाला था । उसके बड़े और लाल वर्ण के नेत्र थे—वह शर और चाप धारण किये हुए था—लम्बे कद वाला तथा वज्र के समान सख्त शरीर वाला और युवा था ।६। उस शबर के बाहु-कन्धे और ठोड़ी ऊँचे थे तथा उसके माथे के केश और मूँछें पिङ्गल वर्णके थे । वह मांस, विस्र और वसा (चर्बी) की गन्ध वाला था अर्थात् उसके शरीर से बुरी गन्ध आ रही थी । वह सभी प्राणियों की हिंसा करने वाला था ।१०। काँटों के समुदाय के निरन्तर स्पर्श करते रहने से बहुत से क्षतों के होने कारण उसका शरीर रूषित था । वह रुधिर के सहित अनेक मांस के टुकड़ों को चबा रहा था ।११। मांस के भार से जो कि उसके दोनों ओर लदा हुआ था उसकी गरदन कुछ नीचे की ओर झुकी हुई थी । बहुत