भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम परीक्षा ] [ १४५

बड़े वेग से युक्त तेजी के साथ चलने से वृक्षों के समूह को वह हिलाता हुआ चल रहा था ।१२। वह पदों से गमन करने वाले पर्वत के समान ही उस स्थल पर उपस्थित हो गया था । वह पुष्पों से समन्वित उस सरोवर के तट पर समागत हुआ था ।१३। उसने किसी वृक्ष की जड़ में उस मांस के भार को उतार कर रख दिया था और कुछ क्षणों के लिए वहां पर उसने वृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण किया था ।१४।

तिष्ठन्तं सरसस्तीरे सोऽपश्यद्भृगुनंदनम् । ततः स शीघ्रमुत्थाय समीपमुपसृत्य च ॥१५ रामाय सेषुचापाभ्यां कराभ्यां विदधैऽजलिम् । सजलांभोदसन्नादगंभीरेण स्वरेण च ॥१६ जगाद भृगुशार्दूलं गुहांतरविसर्पिणा । तोषप्रवर्षव्याधोऽयं वसाम्यस्मिन्महावने ॥१७ ईशोऽहमस्य देशस्य सप्राणितरुवीरुधः । चरामि समचित्तात्मा नानासत्वामिषाशनः ॥१८ समश्च सर्वभूतेषु न च पित्रादयोऽपि मे । अभक्ष्यागम्यपेयादिच्छंदवस्तुषु कुत्रचित् ॥१६ कृत्याकृत्यविधौ चैव न विशेषितधीरहम् । प्रपन्नो नाभिगमनं निवासमपि कस्यचित् ॥२० शक्रस्यापि बलेनाहमनुमन्ये न संशयः । जानते तद्यथा सर्वे देशोऽयं मदुपाश्रयः ॥२१

उस महान् भयङ्कर स्वरूपवान शवर ने वहाँ पर सरोवर के तट पर ध्यान में बैठे हुए उस भृगु नन्दन को देखा था । इसके उपरान्त वह बहुत शीघ्र उठकर उस राम के समीप में आ गया था ।१५। उसने राम के लिये बाण और चाप से युक्त करों से अञ्जलि की थी और जल से परिपूर्ण मेघ के समान परम गम्भीर स्वर से उस भृगु शार्दूल से कहा था जो कि स्वर पर्वत की गुहाओं में फैल गया था । मैं तोष-प्रवर्ष व्याध हूँ और इसी महा-वन में निवास किया करता हूँ ।१६-१७। इस स्थल के समस्त प्राणी और वनस्पतियों का मैं स्वामी हूँ । अनेक जीवों के मांस का भोजन करने वाला