भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम परीक्षा ] [ १४७

की सिद्धि के लिये यहाँ पर समधिष्ठित हो रहे हैं ? अथवा यहाँ से किसी अन्य स्थान में जाने के समुद्यत हैं अथवा आपकी क्या करने की इच्छा है ।२३। श्री वसिष्ठ जी ने कहा—जब उसके द्वारा इस प्रकार से कहा गया तो महान् द्युति से सम्पन्न राम ने हँसकर एक क्षण के लिए चुप होकर कुछ नीचे की ओर मुख करके चिन्तन किया था ।२४। उसने अपने मन में विचार किया था कि यह दुराधर्ष कौन है जिसकी ध्वनि सजल मेघ के सदृश है और अधिक सुस्पष्ट अर्थ वाले पदों से युक्त वाणी बोलता है ।२५। इसका वपु मेरे हृदय में बहुत अधिक शङ्का समुत्पन्न कर रहा है । यह विजातीय है और नीच जाति का समाश्रय पाकर भी इसका शरीर शर की ही भाँति परम रमणीय है ।२६। इस तरह से चिन्तन करते हुए उसको परम शुभ निमित्त हो रहे थे जो भूमि में—देह में अपने अभीष्ट अर्थ के लिये पूर्ण रूप से प्रदान करने वाले थे ।२७। इसके अनन्तर उस भृगु कुल में श्रेष्ठ ने मन से बहुत बार विचार करके धीरे से उस व्याध से सूनृत अक्षरों वाले वचन कहे थे ।२८।

जामदग्न्योऽस्मि भद्रं ते रामो नाम्ना तु भार्गवः । तपश्चर्तुं मिहायातः सांप्रतं गुरुशासनात् ॥२९ तपसा सर्वलोकेशं भक्त्या च नियमेन च । आराधयितुमस्मिंस्तु चिरायाहं समुद्यतः ॥३० तस्मात्सर्वेश्वरं सर्वशरण्यमभयप्रदम् । त्रिनेत्रं पापदमनं शङ्करं भक्तवत्सलम् ॥३१ तपसा तोषयिष्यामि सर्वज्ञं त्रिपुरान्तकम् । आश्रमेऽस्मिन्सरस्तीरे नियमं समुपाश्रितः ॥३२ भक्तानुकंपी भगवा न्यावत्प्रत्यक्षतां हरः । उपैति तावदत्रैव स्थास्यामीति मतिर्मम ॥३३ तस्मादितस्त्वयाद्यैव गन्तुमन्यत्र युज्यते । न चेद्भवति मे हानिः स्वकृतेर्नियमस्य च ॥३४ माननीयोऽथ वाहं ते भक्त्या देशांतरातिथिः । स्वनिवासमुपायातस्तपस्वी च तथा मुनिः ॥३५