भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आपका कल्याण हो—मैं जमदग्नि का पुत्र नाम से मैं भार्गव राम हूँ । इस समय में मैं अपने गुरुदेव के आदेश से यहाँ पर तपश्चर्या का समाचरण करने के ही लिए आया हूँ ।२९। तपस्या-भक्ति और नियम से इस पर्वत पर सर्वलोकेश्वर की आराधना करने को चिरकाल के लिये मैं समुद्यत हुआ हूँ ।३०। इस कारण से सर्वेश्वर—सबकी रक्षा करने वाले—अभय के देने वाले—समस्त पापों के दमन करने वाले—अपने भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले तीन नेत्रों से समन्वित भगवान् शङ्कर को मैं प्रसन्न करूँगा ।३१। मैं अपने तप के द्वारा सर्वज्ञ भगवान् त्रिपुरारि को को सन्तुष्ट करूँगा मैं इस सरोवर के तट पर स्थित आश्रम में नियम से समुपाश्रित हुआ हूँ ।३२। अपने भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले भगवान् शङ्कर जब तक प्रत्यक्ष मुझे दर्शन नहीं देते हैं तब तक मैं यहीं पर स्थित रहूँगा—यही मेरा विचार है ।३३। इस कारण से आप यहाँ से नहीं जाते हैं तो मेरे अपने कृत्य में और नियम में हानि होती है ।३४। अथवा यों समझ लीजिए कि मैं अन्य देश से आया हुआ आपका एक अतिथि हूँ अतएव भक्ति से मैं आपका माननीय होता हूँ । मैं आपके ही अपने निवास स्थल में उपगत हो गया हूँ जो कि मैं एक तपस्वी तथा मुनि हूँ ।३५।

त्वत्संनिधौ निवासो मे भवेत्पापाय केवलम् ।
तव चाप्यसुखोदकं मत्समीपनिषेवणम् ॥३६॥

स त्वं मदाश्रमोपांते परिचक्रमणादिकम् ।
परित्यज्य सुखी भूया लोकयोरुभयोरपि ॥३७॥

वसिष्ठ उवाच—इति तस्य वचः श्रुत्वा स भयो भृगुपुंगवम् ।
उवाच रोषताम्राक्षस्ताम्राक्षमिदमुत्तरम् ॥३८॥

ब्रह्मन् किमिदमत्यर्थं समीपे वसति मम ।
परिगर्ह्यसे येन कृतघ्नस्येव सांप्रतम् ॥३९॥

किं मयापकृतं लोके भवतोऽन्यस्य वा क्वचित् ।
अनागस्कारिणं दांतं कोऽवमन्येत नामतः ॥४०॥

सन्निधिः परिहर्त्तव्यो यदि मे विप्रपुंगव ।
दर्शनं सह संवासः संभाषणमथापि च ॥४१॥