भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 893 में से

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परशुराम परीक्षा ] [ १४६

आयुष्मताऽधुनेवास्मादपसर्त्तव्यमाश्रमात् । स्वसंश्रयं परित्यज्य क्वाहं यास्ये बुभुक्षितः ॥४२॥

आपके समीप में मेरा निवास होना केवल पाप के ही लिए होगा और आपका भी मेरे निकट रहना भविष्य में असुख देने वाला ही होगा अर्थात् मेरे समीप में रहने से आपको भी कष्ट ही होगा ।३६। ऐसे आप मेरे आश्रम के समीप में इधर-उधर घूमने-फिरने के चक्र काटने को त्यागकर आप भी दोनों लोकों में सुखी होइये ।३७। वसिष्ठ जी ने कहा—उस राम के इन वचनों का श्रवण करके वह रोष से लाल नेत्रों को करके रक्त नेत्रों वाले भृगु श्रेष्ठ से यह उत्तर देते हुए कहा ।३८। हे ब्रह्मन् ! मेरे समीप में रहने की आप इतनी अधिक अब क्यों बुराई कर रहे हैं जैसे कोई कृतघ्न किया करता है ।३६। मैंने इस लोक में आपका अथवा कहीं पर अन्य किसी का क्या अपकार किया है ? जो पाप या अपराध नहीं करने वाला है उसका नाम से ही कौन अपमान किया करता है अर्थात् ऐसा तो कोई भी करता है ।४०। हे श्रेष्ठ विप्र ! यदि आपको मेरा समीप में रहना हटाना है और मेरा देखना—साथ में वार्तालाप और एक जगह पर साथ रहना भी दूर करना है तो आयुष्मान् आपको इसी समय में इस आश्रम से अपसरण कर जाना चाहिए । मैं तो बुभुक्षित हूँ और अपने निवास स्थान का परित्याग करके कहाँ पर जाऊँगा ।४१-४२।

स्वाधिवासं परित्यज्य भवता चोदितः कथम् । इतोऽन्यस्मिन् गमिष्यामि दूरे नाहं विशेषतः ॥४३॥ गम्यतां भवताऽन्यत्र स्थीयतामत्र वेच्छया । नाहं चालयितुं शक्यः स्थानादस्मात्कथंचन ॥४४॥ वसिष्ठ उवाच—तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य किंचित्कोपसमन्वितः तमुवाच पुनर्वाक्यमिदं राजन्भृगूद्वहः ॥४५॥ व्याघ्रजातिरियं क्रूरा सर्वसत्त्वभयावहा । खलकर्मरता नित्यं धिक्कृता सर्वजंतुभिः ॥४६॥ तस्यां जातोऽसि पापीयान्सर्वप्राक्षिविहिंसकः । स कथं न परित्याज्यः सुजनैः स्यात्तु दुर्मते ॥४७॥

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