भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शरीरत्राणकारुण्यात्समीपं नोपसर्पसि । यया त्वं कंटकादीनामसहिष्णु तया व्यथाम् ॥४६

आपने अपने स्थान को जो कि आवास का स्थल है मुझे कैसे प्रेरित किया है ? मैं तो यहाँ से विशेष दूरी पर नहीं जाऊँगा ।४३। आपको ही अन्य स्थान में चले जाना चाहिए अथवा इच्छा से यहाँ पर स्थित रहिए । मैं तो इस स्थान से किसी भी प्रकार से भेजा नहीं जा सकता हूँ ।४४। बसिष्ठ जी ने कहा—उस शबर वेषधारी के इस वचन का श्रवण करके वह भृगु कुल के उद्वहन करने वाले राम को कुछ क्रोध आ गया था और हे राजन् ! राम ने उससे यह वाक्य फिर कहा था ।४५। यह व्याध की जो जाति है वह बहुत ही क्रूर है और समस्त प्राणियों को भय देने वाली है । यह जाति नित्य ही दुष्ट कर्मों के करने वाली होती है और सभी जन्तुओं द्वारा यह धिक्कृत है ।४६। उसी व्याध जाति में तुमने जन्म ग्रहण किया है अतः आप समस्त प्राणियों की हिंसा करने वाले अधिक पापी हैं । हे दुष्ट बुद्धि वाले ! वह आप सुजनों के द्वारा कैसे नहीं परित्याग करने के योग्य होते हैं ? ।४७। इस कारण से अपने आपको विशेष हीन जाति वाला समझ कर यहाँ से शीघ्र ही अन्य किसी स्थानमें चले जाओ । इस विषय में अधिक सोच विचार करने की आवश्यकता नहीं करनी चाहिए ।४८। अपने शरीर के परित्राण करने की दया से मेरे समीप मैं नहीं आते हो क्योंकि आपको कण्टक आदि की व्यथा है उसको आप सहन नहीं कर रहे हैं । अपने दुःख के ही समान दूसरे प्राण धारियों का दुःख हुआ करता है ।४६।

तथाऽवेहि समस्तानां प्रियाः प्राणाः शरीरिणाम् । व्यथा चाभिहतानां तु विद्यते भवतोऽन्यथा ॥५०

अहिंसा सर्वभूतानिमिति धर्मः सनातनः । एतद्विरुद्धाचरणान्नित्यं सद्भिर्विगर्हितः ॥५१

आत्मप्राणाभिरक्षार्थं त्वमशेषशरीरिणः । हनिष्यसि कथं सत्सु नाप्नोषि वचनीयताम् ॥५२

तस्माच्छीघ्रं तु भो गच्छ त्वमेव पुरुषाधम । त्वया मे कृत्यदोषस्य हानिश्च न भविष्यति ॥५३

न चेत्स्वयमितो गच्छेस्ततस्तव बलादपि ।