संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम परीक्षा ] [ १५१
अपसर्पणताबुद्धिमहमुत्पादये स्फुटम् ॥५४
क्षणाद्धंमपि ते पाप श्रेयसी नेह संस्थितः ।
विरुद्धाचरणो नित्यं धर्मद्विट् को लभेच्च शम् ॥५५
वसिष्ठ उवाच—रामस्य वचनं श्रुत्वा प्रीतोऽपि तमिदं वचः ।
उवाच संक्रुद्ध इव व्याघ्ररूपी पिनाकधृक् ॥५६
उसी भाँति से समस्त प्राणधारियों को अपने प्राण परम प्रिय हुआ करते हैं—ऐसा ही अपने मन में समझ लो। आप जिनका हनन किया करते हैं उनकी भी व्यथा इसी प्रकार से हुआ करती है और अन्य प्रकार की नहीं होती है ।५०। प्राणिमात्र की हिंसा न करना ही सनातन अर्थात् सदा से चले आने वाला धर्म है। इसके विरुद्ध कार्यों का समाचरण करना ही नित्य सत्पुरुषों के द्वारा बुरा माना जाता है ।५१। अपने प्राणों की अभिरक्षा के ही लिए हम सब शरीर धारियों का हनन किया करेंगे। फिर आगे क्यों नहीं सत्पुरुषों में निन्दा को प्राप्त होंगे ।५२। हे अधम पुरुष ! इस कारण से आप बहुत शीघ्र ही यहाँ से चले जाओ। तुम्हारे द्वारा किए कृत्यों के दोष से मेरे कार्य की कोई हानि नहीं होगी ।५३। यदि आप स्वयं ही यहाँ से नहीं गमन करते हैं तो मैं बलपूर्वक भी स्पष्टतया तुम्हारे अपसर्पण की बुद्धि समुत्पन्न कर देता हूँ ।५४। हे पापात्मन् ! यहाँ पर आधे क्षण भी आपकी संस्थिति अच्छी नहीं है। विरुद्ध आचरण वाला धर्म का द्वेषी ऐसा कौन है जो सदा कल्याण को प्राप्त किया करता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं होता है ।५५। श्री वसिष्ठजी ने कहा—राम के ऐसे वचनों को सुनकर मन में बहुत प्रसन्न होते हुए भी वे स्वरूपधारी भगवान् शंकर क्रुद्ध के ही समान उस राम से यह वचन बोले थे ।५६।
सर्वमेतदहं मन्ये व्यर्थं व्यवसितं तव ।
कुतस्त्वं प्रथमो ज्ञानी कुतः शंभुः कुतस्तपः ॥५७
कुतस्त्वं क्लिश्यसे मूढ तपसा तेन तेऽधुना ।
ध्रुवं मिथ्याप्रवृत्तस्य न हि तुष्यति शङ्करः ॥५८
विरुद्धलोकाचरणः शंभुस्तस्य वितुष्ये ।
प्रतपत्यबुधो मर्त्यस्तबां विना कः सुदुर्मते ॥५९
अथवा च गतं मेऽद्य युक्तमेतदसंशयम् ।