भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

परशुराम परीक्षा ] [ १५१

अपसर्पणताबुद्धिमहमुत्पादये स्फुटम् ॥५४
क्षणाद्धंमपि ते पाप श्रेयसी नेह संस्थितः ।
विरुद्धाचरणो नित्यं धर्मद्विट् को लभेच्च शम् ॥५५
वसिष्ठ उवाच—रामस्य वचनं श्रुत्वा प्रीतोऽपि तमिदं वचः ।
उवाच संक्रुद्ध इव व्याघ्ररूपी पिनाकधृक् ॥५६

उसी भाँति से समस्त प्राणधारियों को अपने प्राण परम प्रिय हुआ करते हैं—ऐसा ही अपने मन में समझ लो। आप जिनका हनन किया करते हैं उनकी भी व्यथा इसी प्रकार से हुआ करती है और अन्य प्रकार की नहीं होती है ।५०। प्राणिमात्र की हिंसा न करना ही सनातन अर्थात् सदा से चले आने वाला धर्म है। इसके विरुद्ध कार्यों का समाचरण करना ही नित्य सत्पुरुषों के द्वारा बुरा माना जाता है ।५१। अपने प्राणों की अभिरक्षा के ही लिए हम सब शरीर धारियों का हनन किया करेंगे। फिर आगे क्यों नहीं सत्पुरुषों में निन्दा को प्राप्त होंगे ।५२। हे अधम पुरुष ! इस कारण से आप बहुत शीघ्र ही यहाँ से चले जाओ। तुम्हारे द्वारा किए कृत्यों के दोष से मेरे कार्य की कोई हानि नहीं होगी ।५३। यदि आप स्वयं ही यहाँ से नहीं गमन करते हैं तो मैं बलपूर्वक भी स्पष्टतया तुम्हारे अपसर्पण की बुद्धि समुत्पन्न कर देता हूँ ।५४। हे पापात्मन् ! यहाँ पर आधे क्षण भी आपकी संस्थिति अच्छी नहीं है। विरुद्ध आचरण वाला धर्म का द्वेषी ऐसा कौन है जो सदा कल्याण को प्राप्त किया करता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं होता है ।५५। श्री वसिष्ठजी ने कहा—राम के ऐसे वचनों को सुनकर मन में बहुत प्रसन्न होते हुए भी वे स्वरूपधारी भगवान् शंकर क्रुद्ध के ही समान उस राम से यह वचन बोले थे ।५६।

सर्वमेतदहं मन्ये व्यर्थं व्यवसितं तव ।
कुतस्त्वं प्रथमो ज्ञानी कुतः शंभुः कुतस्तपः ॥५७
कुतस्त्वं क्लिश्यसे मूढ तपसा तेन तेऽधुना ।
ध्रुवं मिथ्याप्रवृत्तस्य न हि तुष्यति शङ्करः ॥५८
विरुद्धलोकाचरणः शंभुस्तस्य वितुष्ये ।
प्रतपत्यबुधो मर्त्यस्तबां विना कः सुदुर्मते ॥५९
अथवा च गतं मेऽद्य युक्तमेतदसंशयम् ।

१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

संपूज्य पूजकविधौ शंभोस्तव च संगमः ॥६० त्वया पूजयितुं युक्तः स एव भुवने रतः । संपूजकोऽपि तस्य त्वं योग्यो नात्र विचारणा ॥६१ पितामहस्य लोकानां ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । शिरश्छित्त्वा पुनः शम्भुर्ब्रह्महत्यामवाप्तवान् ॥६२ ब्रह्महत्याभिभूतेन प्रायस्त्वं शंभुना द्विज । उपदिष्टोऽसि तत्कर्तुं नोचेदेवं कथं कृथाः ॥६३

मैं यह सब कुछ मानता हूँ तथापि आपका ऐसा निश्चय कि भगवान् शङ्कर का दर्शन प्राप्त करूंगा यह सब व्यर्थ है। कहाँ तो प्रथम ज्ञानी हैं—कहाँ भगवान् देवों के देव शम्भु हैं तथा कहाँ उनको प्राप्त करने के लिए यह तुम्हारी तपस्या है ? अर्थात् भगवान् शम्भु के प्रत्यक्ष करने के लिए कहीं अत्यधिक ज्ञान और विशेष तपस्या होनी चाहिए क्योंकि वे साधारण साधन से प्राप्त होने वाले नहीं हैं। आपकी साधना सर्वथा अकिञ्चित्कर है ।५७। हे मूढ़ ! इस समय में इस तप के द्वारा आप क्यों क्लेशित हो रहे हैं ? यह निश्चय है कि इस तरह से मिथ्याप्रवृत्ति वाले आपसे भगवान् शङ्कर कभी भी सन्तुष्ट नहीं होंगे ।५८। हे सुदुर्मते ! शम्भु तो लोक के आचरण के सर्वथा विरुद्ध हैं । उनकी विशेष तुष्टि के लिए तुमको छोड़कर कौन अबुद्ध ऐसी प्रकृष्ट तपस्या किया करता है अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं करता है ।५६। और अथवा मैं आज गया और यह बिना ही संशय के युक्त है । पूज्य और पूजन की विधि में भगवान् शम्भु का और आपका सङ्गम है ।६०। आपके द्वारा उनकी पूजा करना युक्त है । वे ही समस्त भुवन में रत हैं। उनकी भली भाँति पूजा करने वाले आप भी योग्य हैं—इसमें कोई संशय नहीं है ।६१। समस्त लोकों के पिता यह परमेष्ठी ब्रह्माजी के शिर का छेदन करके शम्भु ने फिर ब्रह्म हत्या प्राप्त की थी ।६२। हे द्विज ! ब्रह्महत्या से अभिभूत शम्भु ने प्रायः आपको उपदेश दिया है कि ऐसा करें । यदि ऐसा नहीं है तो आप इस रीति से कैसे कर रहे हैं ।६३।

तादात्म्यगुणसंयोगान्मन्ये रुद्रस्य तेऽधुना । तप सिद्धिरनुप्राप्ता कालेनाल्पीयसा मुने ॥६४ प्रायोऽद्य मातरं हत्वा सर्वैर्लोकैर्निराकृतः ।

परशुराम परीक्षा ] [ १५३

तपोव्याजेन गहने निर्जने संप्रवर्त्तसे ॥६५॥
गुरुस्त्रीब्रह्महत्योत्थपातकक्षपणाय च ।
तपश्चरसि नानेन तपसा तत्प्रणश्यति ॥६६॥
पातकानां किलान्येषां प्रायश्चित्तानि सन्त्यपि ।
मातृद्रुहामवेहि त्वं न क्वचित्किल निष्कृतिः ॥६७॥
अहिंसालक्षणो धर्मो लोकेषु यदि ते मतः ।
स्वहस्तेन कथं राम मातरं कृत्तवानसि ॥६८॥
कृत्वा मातृवधं घोरं सर्वलोकविगर्हितम् ।
त्वं पुनर्धार्मिको भूत्वा कामतोऽन्यान्र्विनिन्दसि ॥६९॥
पश्यता हसतामोघं आत्मदोषमजानता ।
अपर्याप्तमहं मन्ये परं दोषविमर्शनाम् ॥७०॥

मैं ऐसा मानता हूँ कि अब भगवान् रुद्र के तादाम्य के संयोग से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं। हे मुने ! यह सिद्धि की प्राप्ति बहुत ही थोड़े समय में हो जायगी ।६४। बहुधा आप आज अपनी माता का हनन करके सभी लोगों के द्वारा निरादृत हो गये हैं और तपस्या के करने के बहाने से इस निर्जन वन में सबसे निरादर पाकर प्रवृत्त हो गये हैं ।६५। गुरु-स्त्री और ब्रह्महत्या से समुत्पन्न पातक के दूर करने के लिए ही आप तपश्चर्या का समाचरण कर रहे हैं सो वह पातक इस तप से कभी भी विनष्ट नहीं होता है ।६६। अन्य प्रकार के किये हुए पातकों के निश्चित रूप से प्रायश्चित्त भी हैं। आप यह समझ लेवें कि जो माता से द्रोह करने वाले हैं कहीं भी उनके पातकों का प्रायश्चित्त नहीं है।६६। हे राम ! यदि आपको यह सम्मत है कि अहिंसा के लक्षण वाला धर्म है जो कि सभी लोकों में माना गया है तो फिर आपने ही अपने ही हाथ से अपनी माता को कैसे काट दिया था ? ।६८। समस्त लोकों में परमाधिक निन्दित घोर माता का वध करके फिर बड़े धार्मिक बनकर अपनी इच्छा से अन्य लोगों की विशेष निन्दा कर रहे हैं ।६९। इस अमोघ अपने दोष को देखते हुए भी उसको नहीं जानते हैं और हँस रहे हैं। मैं तो इस दूसरों के दोषों के विर्शना को पर्याप्त नहीं मानता हूँ ।७०।

१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वधर्मं यद्यहं त्यक्त्वा वर्त्तेयमकुतोभयम् । तर्हि गर्ह्य मां कामं निरूप्य मनसा स्वयम् ॥७१ मातापितृसुतादीनां भरणायैव केवलम् । क्रियते प्राणिहननं निजधर्मतया मया ॥७२ स्वधर्मादामिषेणाहं सकुटुम्बो दिनेदिने । वर्त्तामि साऽपि मे वृत्तिर्विधात्रा विहिता पुरा ॥७३ मांसेन यावता मे स्यान्नित्यं पित्रादि पोषणम् । हनिष्ये चेत्तदधिकं तर्हि युज्येयमेनसा ॥७४ यावत्पोषणघातेन न वयं स्याम निन्दिताः । तदेतत्संप्रधार्य्य त्वं वा मां प्रशंस वा ॥७५ साधु वाऽधु वा कर्म यस्य यद्विहितं पुरा । तदेव तेन कर्त्तव्यमापद्यपि कथंचन ॥७६ निरूपय स्वबुद्ध्या त्वमात्मनो मम चांतरम् । अहं तु सर्वभावेन मित्रादिभरणे रतः ॥७७

यदि मैं अपने धर्म का त्याग कर अकुतोभय अर्थात् निर्भीकता वाला होते हुए बरताव करूँ तो स्वयं मन से निरूपण करके मुझे इच्छा पूर्वक निन्दित कहिए ।७१। मैं तो अपने माता-पिता और पुत्र आदि के भरण-पोषण के ही लिए केवल अपने धर्म के कारण ही प्राणियों का वध किया करता हूँ ।७३। अपने ही धर्म होने से प्रतिदिन अपने कुटुम्ब का भरण मांस से किया करता हूँ और यह भी मेरी वृत्ति पहिले ही विधाता ने बना दी है ।७२। जितने मांस से नित्य ही मेरे माता-पिता और पुत्र आदि का भरण हो जाता है उतने ही प्राणियों का में हनन किया करता हूँ। इससे भी अधिक मैं हनन करूँ तो मैं पाप से युक्त होऊँगा ।७४। जितने मांस से सबका पोषण होते उतने ही प्राणियों के घात करने से हम लोग कभी भी निन्दित नहीं होते हैं। यह सबका विचार करके ही आप मेरी निन्दा करें या प्रशंसा करें ।७५। अच्छा हो या बुरा ही जिसका जो कर्म पहिले ही विधाता ने बना दिया है वही कर्म किसी भी प्रकार से आपत्काल में भी उसे करना चाहिए ।७६। अब आप स्वयं अपनी ही बुद्धि से मेरे कर्म में जो भी अन्तर हो उसका

२. प्रथम खण्ड — उपोद्घातपाद (ऋषिवंश व मन्वन्तर)

[शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १५५

निरूपण कर लीजिए। मैं तो सब प्रकार से मित्र आदि के भरण पोषण के ही कार्य में निरत रहा करता हूँ ।७७।

सत्यज्य पितरं वृद्धं विनिहत्य च मातरम् । भूत्वा तु धार्मिकस्त्वं तु तपश्चर्तुंमिहागतः ॥७८ ये तु मूलविदस्तेषां विस्पष्टं यत्र दर्शनम् । यथाजिह्मं भवेन्नात्र वचसापि समीहितुम् ॥७९ अहं तु सम्यग्जानामि तव वृत्तमशेषतः । तस्मादलं ते तपसा निष्फलेन भृगूद्वह ॥८० सुखमिच्छसि चेत्त्यक्त्वा कायक्लेशशंकरं तपः । याहि राम त्वमन्यत्र यत्र वा न विदुर्जनाः ॥८१

अब अपने कर्मों की ओर दृष्टिपात करिए। आपने अपने परम वृद्ध पिता का परित्याग कर दिया है और अपनी आपको जन्म देकर अपने स्तनों के दुग्ध से पोषण करने वाली माता का विहनन कर दिया है। यह बुरे से बुरा कर्म करके भी आप परम धार्मिक बनकर तपश्चर्या करने के लिए यहाँ पर समागत हो गये हैं ।७८। जो लोग उनके मूल के ज्ञाता हैं उनको विस्पष्ट दर्शन होता है। यह जिह्वा से कहकर वचनों के द्वारा समीहित करने का विषय यहाँ पर नहीं है ।७९। मैं तो आपका सम्पूर्ण आचरण भली भाँति जानता हूँ और मुझे पूर्ण उसका ज्ञान है। हे भृगूद्वह ! इस कारण से यह आपका तप निष्फल है। इसे व्यर्थ मत करो ।८०। भाई अपना सुख चाहते हो तो इस काया को क्लेशित करने वाले तप का त्याग कर दीजिए। हे राम ! अब आप किसी भी अन्य स्थान में चले जाइए जहाँ पर कि कोई भी मनुष्य आपको न जान सकें ।७१।


॥ शैवास्त्र की प्राप्ति ॥

वसिष्ठ उवाच—इत्युक्तस्तेन भूपाल रामो मतिमतां वरः । निरूप्य मनसा भूयस्तमुवाचाभिविस्मितम् ॥१ राम उवाच—कस्त्वं ब्रूहि महाभाग न वै प्राकृतपूरुषः । इन्द्रस्येवानुभावेन वपुरालक्ष्यते तव ॥२

१५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विचित्रार्थपदौदार्यगुणगाम्भीर्यजातिभिः । सर्वज्ञस्येव ते वाणी श्रूयतेऽतिमनोहरा ॥३ इन्द्रो वह्निर्यमो धाता वरुणो वा धनाधिपः । ईशानस्तपनो ब्रह्मा वायुः सोमो गुरुर्गुहः ॥४ एषामन्यतमः प्रायो भवान्भवितुमर्हति । अनुभावेन जातिस्ते हृदि शंकां तनोति मे ॥५ मायावी भगवान्विष्णुः श्रूयते पुरुषोत्तमः । को वा त्वं वपुषानेन ब्रूहि मां समुपागतः ॥६ अथ वा जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः । परमात्मात्मसंभूतिरात्मारामः सनातनः ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा-हे भूपाल ! मतिमानों में परम श्रेष्ठ राम से जब इस प्रकार से कहा गया था तो फिर उसने मन से निरूपण करके बहुत ही विस्मित होते हुए उससे कहा था ।१। राम ने कहा—हे महान् भाग वाले ! आप मुझे यह बतलाइए कि आप कौन हैं ? आप कोई प्राकृत पुरुष तो हैं नहीं । आपका शरीर तो अनुभाव से इन्द्र के ही समान लक्षित हो रहा है ।२। विचित्र अर्थ वाले पदों की उदारता-गुणों की गम्भीरता की जातियों से आपकी वाणी सर्वज्ञ की ही अधिक मनोहर सुनाई दे रही है ।३। आप या तो इन्द्र हैं—अग्निदेव हैं—यम-धाता—वरुण अथवा कुबेर हैं । आप या तो ईशान है—तपन-ब्रह्मा-वायु-सोम-गुरु और या गुह हैं ।४। इन ऊपर बताये हुओं में से ही आप कोई से भी एक हो सकते हैं—यही बहुधा प्रतीत होता है । आपके अनुभाव कुछ ऐसे ही हैं कि मेरे हृदय में आपकी जाति बड़ी भारी शंका उत्पन्न कर रही है ।५। भगवान् विष्णु बहुत अधिक मायावी हैं—ऐसा पुरुषोत्तम प्रभु के विषय में श्रवण किया जाता है । आप वास्तव में कौन हैं जो कि इस शरीर को धारण करके यहाँ समागत हुए हैं—यह आप मुझे स्पष्टतया बतलाने की कृपा करें । अथवा समस्त भुवनों के स्वामी—सब कुछ के ज्ञाता साक्षात् परमेश्वर हैं जो परमात्मा से ही आत्मा की उत्पत्ति वाले सनातन आत्माराम हैं ।६-७।

स्वच्छन्दचारी भगवाञ्छिवः सर्वजगन्मयः । वपुषानेन संयुक्तो भवान्भवितुमर्हति ॥८

शैवशास्त्र की प्राप्ति ] [ १५७

नान्यस्येदृग्भवेल्लोके प्रभावानुगतं वपुः ।
जात्यर्थसौष्ठवोपेतः वाणी चौदार्यशालिनी ॥६
मन्येऽहं भक्तवात्सल्याद्नानेन वपुषा हरः ।
प्रत्यक्षतामुपगतो संदेहोऽस्मत्परीक्षया ॥१०
न केवलं भवान् व्याधस्तेषां नेदृग्विधाकृतिः ।
तस्मात्तुभ्यं नमस्तस्मै सुरूपं संप्रदर्शय ॥११
आविष्कुर्वन्प्रसीदात्ममहिमानुगुणं वपुः ।
ममानेकविधा शंका मुच्येत येन मानसी ॥१२
प्रसीद सर्वभावेन बुद्धिमोहो ममाधुना ।
प्रणाशय स्वरूपस्य ग्रहणादेव केवलम् ॥१३
प्रार्थये त्वां महाभाग प्रणम्य शिरसासकृत् ।
कस्त्वं मे दर्शयात्मानं बद्धोऽयं ते मयाञ्जलिः ॥१४

परम स्वच्छन्दता के साथ सञ्चरण करने वाले सम्पूर्ण जगत् के स्वरूप वाले आप साक्षात् भगवान् शिव हैं जो इस शबर के शरीर को धारण करके यहाँ पर स्थित हैं। मुझे तो ऐसा ही लगता है कि आप भग-वान् शम्भु हो सकते हैं ।८। इस लोक में अन्य किसी का भी ऐसा प्रभाव से अनुगत शरीर नहीं होता है। जाति का अर्थ के सौष्ठव से युक्त और उदा-रता की शोभा वाली आपकी वाणी है ।६। मैं तो अब ऐसा ही समझ रहा हूँ कि भगवान् हर ही भक्त के ऊपर वात्सल्य होने के कारण से इस शरीर को धारण कर मेरी परीक्षा करने के लिए प्रत्यक्ष स्वरूप में उपागत हुए हैं-ऐसा ही कुछ सन्देह होता है ।१०। आप केवल व्याध तो नहीं हैं—यह निश्चय है क्योंकि इस प्रकार की आकृति कभी होती ही नहीं है। इस कारण से मेरा आपकी सेवा में प्रणाम निवेदित है। अब कृपया अपना वास्तविक स्वरूप प्रदर्शित कीजिए ।११। मेरे ऊपर प्रसन्न होइए और अपनी महिमा के अनुरूप वपु को प्रकट कर दीजिए जिससे मेरे मन में जो अनेक तरह की शङ्काएँ उठ रही हैं, उनसे मेरा छुटकारा हो जावे ।१२। आप पूर्ण रूप से प्रसन्न होइए और इस समय में जो विचलित बुद्धि हो रही है तथा उसके कारण जो मुझे महान् मोह उत्पन्न हो रहा है उसका विनाश कीजिए। यह केवल आपके सत्य स्वरूप के ग्रहण करने ही से हो जायगा

१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।१३। हे महाभाग ! मेरी यह विनम्र प्रार्थना है और मैं बारम्बार आपको शिर से प्रणाम करके आपसे विनती करता हूँ कि आप कौन हैं--मुझे अपना सत्य स्वरूप दिखला दीजिए-मैं आपके लिए दोनों हाथ को जोड़कर विनय कर रहा हूँ ।१४।

इत्युक्त्वा तं महाभाग ज्ञातुमिच्छन्भृगूद्वहः । उपविश्य ततो भूमौ ध्यानमास्ते समाहितः ॥१५ बद्धपद्मासनो मौनी यतवाक्कायमानसः । निरुद्धप्राणसंचारों दध्यौ चिरमुदारधीः ॥१६ सन्नियम्येंद्रियग्रामं मनो हृदि निरुध्य च । चिंतयामास देवेशं ध्यादृष्ट्या जगद्गुरुम् ॥१७ अपश्यच्च जगन्नाथमात्मसंधानचक्षुषा । स्वभक्तानुग्रहकरं मृगव्याधस्वरूपिणम् ॥१८ तत उन्मील्य नयने शीघ्रमुत्थाय भार्गवः । ददर्श देवं तेनैव वपुषा पुरतः स्थितम् ॥१९ आत्मनोऽनुग्रहार्थाय शरण्यं भक्तवत्सलम् । आविर्भूतं महाराज दृष्ट्वा रामः ससंभ्रमम् ॥२० रोमाञ्चोद्भिन्नसर्वांगो हर्षाश्रुप्लुतलोचनः । पपात पादयोर्भूमौ भक्त्या तस्य महामतिः ॥२१

हे महाभाग ! उस शबर के वेषधारी से यह इतना कहकर उस भृगूद्वह ने सत्य स्वरूप के ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा करते हुए भूमि पर बैठकर वह परम समाहित होकर ध्यान में संलग्न हो गया था ।१५। उस उदार बुद्धि वाले ने पद्मासन बाँध लिया था और मौन होकर वाणी-शरीर और मन को संयत कर लिया था । फिर उसने प्राण वायु के सञ्चार का निरोध करके चिरकाल पर्यन्त ध्यान लगा लिया था ।१६। इन्द्रियों के समूह को भली भांति नियमित करके हृदय में मन को निरुद्ध कर लिया और फिर ध्यान की ही दृष्टि से जगद्गुरु देवेश्वर का चिन्तन किया था ।१७। और फिर आत्म सन्धान की चक्षु से उन जगतों के स्वामी-अपने भक्तों पर परम अनुग्रह करने वाले को मृगों के शिकारी व्याध के स्वरूप को धारण करने

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १५६

वाले को देखा था।१८। इसके अनन्तर अपनी आंखें खोलकर भार्गव ने शीघ्र उठकर उसी शरीरसे संयुक्त और सामने स्थित देव का दर्शन किया था ।१६। हे महाराज ! अपने ऊपर अनुग्रह करने के लिए-भक्तो पर प्रेम करने वाले तथा शरण में समागत के रक्षक देवेश्वर को राम ने बड़े सम्भ्रम के साथ प्रकट हुए देखा था ।२०। उस महामति के अङ्गों में रोमाञ्च उद्भिन्न हो गये थे और परमाधिक हर्ष के उद्वेक से आनन्दाश्रुओं से नेत्र भर गये थे । फिर भक्तिभाव से वह उनके चरणों में भूमि पर उनके सामने गिर गया था अर्थात् उसने उनके चरण कमलों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया था ।२१।

स गद्गदमुवार्चनं संभ्रमाकुलया गिरा ।
शरणं भव शर्वेति शंकरेत्यसकृन्नृप ॥२२
ततः स्वरूपधृक् शंभुस्तद्भक्तिपरितोषितः ।
राममुत्थापयामास प्रणामावनतं भुवि ॥२३
उत्थापितो जगद्धात्रा स्वहस्ताभ्यां भृगूद्वहः ।
तुष्टाव देवदेवेशं पुरः स्थित्वा कृतांजलिः ॥२४
राम उवाच—नमस्ते देवदेवाय शंकरायादिमूर्त्तये ।
नमः शर्वाय शांतय शाश्वताय नमोनमः ॥२५
नमस्ते नीलकण्ठाय नीललोहितमूर्त्तये ।
नमस्ते भूतनाथाय भूतवासाय ते नमः ॥२६
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय महादेवाय मीढुषे ।
शिवाय बहुरूपाय त्रिनेत्राय नमोनमः ॥२७
शरणं भव मे शर्व त्वद्भक्तस्य जगत्पते ।
भूयोऽनन्याश्रयाणां तु त्वमेव हि परायणम् ॥२८

हे नृप ! उस राम ने सम्भ्रम से समाकुलित वाणी से गद्गद कण्ठ होकर इन प्रभु से कहा था और बारम्बार हे सर्व ! आप मेरे रक्षक होइए ऐसी प्रार्थना की थी ।२२। इसके अनन्तर अपने स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु ने राम की भक्ति के भाव से परम सन्तुष्ट होते हुए भूमि में प्रणाम करने में पड़े हुए उसको ऊपर अपने कर कमलों से उठा लिया था ।२३। जगत् के धाता के द्वारा अपने ही करों से वह भृगूद्वह ऊपर उठा लिया गया

१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था। फिर उस राम ने उनके समक्ष में स्थित होकर हाथ जोड़कर उन देव-देवेश्वर का स्तवन किया था ।२४। राम ने कहा—देवों के भी देव आदि मूर्ति भगवान् शङ्कर के लिये मेरा प्रणाम स्वीकार हो । शर्वे—परमशान्त और शाश्वत प्रभु शम्भु के लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।२५। नीलकण्ठ और नील-लोहित मूर्ति वाले के लिए मेरा अनेक बार प्रणाम निवेदित है । आप तो भूतों के नाथ हैं ऐसे भूतवास आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।२६। आपका स्वरूप व्यक्त है और अव्यक्त भी है ऐसे महादेव—मीढु—शिव—त्रिनेत्र और अनेक रूप वाले देवेश की सेवा में मेरा बारम्बार प्रणाम स्वीकार हो ।२७। हे जगत् के स्वामिन् ! हे शर्व ! आपके ही चरणों में भक्ति रखने वाले मेरे आप रक्षक हो जाइए । जो किसी अन्य देव का समाश्रय ग्रहण न कर आपके ही चरणों का आश्रय लेते हैं वे अनन्य भक्त होते हैं उनके लिए आप ही परायण हैं ।२८।

यन्मयाऽपकृतं देव दुरुक्तं वापि शंकर ।
अजानता त्वां भगवन्मम तत्क्षंतुमर्हसि ।।२९
अनन्यवेद्यरूपस्य सद्भावमिह कः पुमान् ।
त्वामृते तव सर्वेश सम्यक् शक्नोति वेदितुम् ।।३०
तस्मात्त्वं सर्वभावेन प्रसीद मम शंकर ।
नान्यास्ति मे गतिस्तुभ्यं नमो भूयो नमो नमः ।।३१
वसिष्ठ उवाच—इति संस्तूयमानस्तु कृतांजलिपुटं पुरः ।
तिष्ठंतमाह भगवान्प्रसन्नात्मा जगन्मयः ।।३२
भगवानुवाच—प्रीतोऽस्मि भवते तात तपसाऽनेन सांप्रतम् ।
भक्त्या चैवानपायिन्या ह्यपि भार्गवसत्तम ।।३३
दास्ये चाभिमतं सर्वं भवतेऽहं त्वया वृतम् ।
भक्तो हि मे त्वमत्यर्थं नात्र कार्या विचारणा ।।३४
मयैवावगतं सर्वं हृदि यत्तेऽद्य वर्त्तते ।
तस्माद्ब्रवीमि यत्त्वाहं तत्कुरुष्वाविशंकितम् ।।३५

हे शङ्कर ! मैंने जो भी कुछ अपकार किया है अथवा आपके प्रति मैंने जो बुरे शब्दों का प्रयोग किया था वह मेरे अज्ञान के कारण से ऐसा

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६१

हुआ था क्योंकि मैं आपको जान नहीं पाया था। उस सबको आप क्षमा करने के योग्य होते हैं।२६। अनन्य वेद्य रूप वाले आपके सद्भाव को कौन-सा पुरुष हे सर्वेश ! और आपको भले प्रकार से जान सकता है अर्थात् कोई भी नहीं जानता है ।३०। हे शङ्कर ! इस कारण से आप सर्वभाव से मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाइए। आपके बिना मेरी अन्य कोई भी गति नहीं है अर्थात् मेरा उद्धार केवल आप ही कर सकते हैं अतएव आपके लिए मेरा पुनः बारम्बार नमस्कार है ।३१। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से सामने स्थित होकर दोनों करों को जोड़े हुए वह स्तुति कर रहा था। जगन्मय प्रसन्न आत्मा वाले भगवान् ने उससे कहा था ।३२। भगवान् ने कहा—हे तात ! अब आपकी इस तपश्चर्या से आपके ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। हे भार्गवों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपकी अनपायिनी भक्ति से अत्यधिक प्रसन्न हूँ ।३३। जो भी आपने अपने मन में विचार रखा है वह सभी कुछ मैं आपको दे रहा दूँगा। आप मेरे बहुत ही अधिक प्रिय भक्त हैं—इसमें कुछ भी संशय वाली बात नहीं है ।३४। इस समय में जो भी कुछ आपके हृदय में है वह मुझे सभी अवगत है अर्थात् उस सबको मैं भली भाँति जानता हूँ। इसी कारण से मैं आपको बतलाता हूँ और आप कोई भी विशेष शङ्का न रखते हुए वही करिए ।३५।

नास्त्राणां धारणे वत्स विद्यते शक्तिरद्य ते । रौद्राणां तेन भूयोऽपि तपो घोरं समाचर ॥३६॥

परीत्य पृथिवीं सर्वां सर्वतीर्थेषु च क्रमात् । स्नात्वा पवित्रदेहस्त्वं सर्वाण्यस्त्राण्यवाप्स्यसि ॥३७॥

इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तेनैव वपुषा विभुः । रामस्य पश्यतो राजन्क्षणेन भवभागकृत् ॥३८॥

अंतर्हिते जगन्नाथे रामो नत्वा तु शंकरम् । परीत्य वसुधां सर्वां तीर्थस्नानेऽकरोन्मनः ॥३६॥

ततः स पृथिवीं सर्वां परिक्रम्य यथाक्रमम् । चकार सर्वतीर्थेषु स्नानं विधिवदात्मवान् ॥४०॥

तीर्थेषु क्षेत्रमुख्येषु तथा देवालयेषु च । पितॄन्देवांश्च विधिवदतर्पयदतंद्रितः ॥४१॥

१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उपवासतपोहोमजपस्नानादिसुक्रियाः । तीर्थेषु विधिवत्कुर्वन्परिचक्राम मेदिनीम् ॥४२

हे वत्स ! आज आपके अन्दर अस्त्रों के धारण करने की शक्ति नहीं है। ये सब रौद्र अस्त्र हैं। इससे आप फिर भी परम घोर तप का समाचरण कीजिए ।३६। इस सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करके क्रम से समस्त तीर्थ स्थलों में स्नान कीजिए। फिर जब आप पवित्र शरीर वाले हो जाँयगे तो आप सभी अस्त्रों को प्राप्त करेंगे ।३७। इतना यह कर देवेश्वर विभु उसी शरीर से वहाँ पर अन्तर्हित हो गये थे। हे राजन् ! राम यह देख ही हो गये थे ।३८। जगत् के स्वामी के अन्तर्हित हो जाने पर राम ने भगवान् शङ्कर को प्रणाम किया था और फिर सम्पूर्ण वसुधा पर भ्रमण करके तीर्थों में स्नान करने का मन में निश्चय किया था ।३९। इसके उपरान्त आत्मवान् उसने क्रमानुसार सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा लगाकर समस्त तीर्थों में विधिविधान के साथ स्नान किया था ।४०। तन्द्रा से रहित होकर उसने मुख्य क्षेत्रों में—तीर्थों में तथा देवालयों में पितृगणों का और देवों का विधि के सहित तर्पण किया था ।४१। उपवास—तप—जप—होम और स्नान आदि की सुन्दर क्रियाएँ तीर्थों में विधिपूर्वक करते हुए उसने पृथ्वी पर परिक्रमण किया था ।३२।

एवं क्रमेण तीर्थेषु स्नात्वा चैव वसुन्धराम् । प्रदक्षिणीकृत्य शनैः शुद्धदेहोऽभवन्नृप ॥४३ परीत्यैवं वसुमतीं भार्गवः शंभुशासनात् । जगाम भूयस्तं देशं यत्र पूर्वमुवास सः ॥४४ गत्वा राजन्स तत्रैव स्थित्वा देवमुमापतिम् । भक्त्या संपूजयामास तपोभिर्नियमैरपि ॥४५ एतस्मिन्नेव काले तु देवानामसुरैः सह । बभूव सुचिरं राजन्संग्रामो रोमहर्षणः ॥४६ ततो देवान्पराजित्य युद्धेऽतिबलिनोऽसुराः । अवापुरमरैश्वर्यमशेषमकुतोभयाः ॥४७ युद्धे पराजिता देवा सकला वासवादयः । शंकरं शरणं जग्मुर्हतैश्वर्या ह्यरातिभिः ॥४८

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६३

तोषयित्वा जगन्नाथं प्रणामजयसंस्तवैः ।
प्रार्थयामासुरसुरान्हन्तुं देवाः पिनाकिनम् ॥४६॥

हे नृप ! इस प्रकार से क्रम से तीर्थों में स्नान करके और सम्पूर्ण पृथिवी की प्रदक्षिणा करके धीरे-धीरे वह शुद्ध देह वाला हो गया था ॥४३॥ वह भार्गव राम शम्भु भगवान् के शासन से इस रीति से पृथिवी की परिक्रमा देकर फिर वह उसी भू भाग पर पहुँच गया था जहाँ पर कि वह प्रथम समय में निवास करता था ॥४४॥ हे राजन् ! वह वहाँ पर जाकर स्थित हो गया था और तप तथा नियमों के द्वारा भक्ति-भाव से उमा के पति देवेश्वर का भले प्रकार से पूजन किया था ॥४५॥ उसी समय में हे राजन् ! देवों का असुरोंके साथ बहुत समय तक बड़ा ही भीषण रोमहर्षण युद्ध हुआ था ॥४६॥ इसके पश्चात् महान् बलशाली असुरों ने सब देवों को युद्ध में पराजित करके सम्पूर्ण जो देवों का ऐश्वर्य था उसको ग्रहण कर लिया था और फिर वे निर्भीक होकर रहने लगे थे ॥४७॥ उस युद्ध में सब इन्द्र आदि देवगण पराजित हो गये थे और शत्रुओं के द्वारा अपहृत वैभव वाले सब भगवान् शंकर की शरणागति में प्राप्त हुए थे ॥४८॥ उन देवगणों ने जगत के नाथ भगवान पिनाकी को प्रणाम-जय और संस्तवनों के द्वारा प्रसन्न कर लिया था और फिर उन्होंने भगवान् शङ्कर से असुरों के हनन करने के लिए प्रार्थना की थी ॥४६॥

ततस्तेषां प्रतिश्रुत्य दानवानां वधं नृप ।
देवानां वरदः शंभुर्महोदरमुवाच ह ॥५०॥
हिमाद्रेर्दक्षिणे भागे रामो नाम महातपाः ।
मुनिपुत्रोऽतितेजस्वी मामुद्दिश्य तपस्यति ॥५१॥
तत्र गत्वा त्वमद्यैव विवेद्य मम शासनम् ।
महोदर तपस्यंतं तमिहानय माचिरम् ॥५२॥
इत्याज्ञप्तस्तथेत्युक्त्वा प्रणम्येशं महोदरः ।
जगाम वायुवेगेन यत्र रामो व्यवस्थितः ॥५३॥
समासाद्य स तं देशं दृष्ट्वा रामं महामुनिम् ।
तपस्यंतमिदं वाक्यमुवाच विनयान्वितः ॥५४॥

१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्रष्टुमिच्छति शम्भुस्त्वां भृगुवर्यं तदाज्ञया । आगतोऽहं तदागच्छ तत्पादाम्बुजसन्निधिम् ॥५५ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शीघ्रमुत्थाय भार्गवः । तदाज्ञां शिरसानन्द्य तथेति प्रत्यभाषत ॥५६

इसके अनन्तर हे नृप ! उन दानवों के वध के लिए प्रतिज्ञा करके देवों को वरदान प्रदान करने वाले भगवान् शम्भुने महोदर से कहा था ।५०। हिमवान पर्वत के दक्षिण भाग में एक राम नाम वाला महान तपस्वी है। वह मुनि का पुत्र बहुत ही अधिक तेजस्वी है जो कि मेरा ही उद्देश्य लेकर तप करता है ।५१। वहाँ आज ही जाकर तुम मेरे आदेश को उससे कह दो हे महोदर ! उस तपश्चर्या करने वाले को यहाँ पर ले आओ और इस कार्य में विलम्ब मत करो ।५२। इस प्रकार से आज्ञा पाया हुआ वह महोदर—मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर और ईश को प्रणाम करके वायु के समान अति तीव्र वेग से वहाँ पर चला गया था जहाँ पर राम व्यवस्थित था ।५३। उस देश पर पहुँच कर उसने महामुनि राम का दर्शन किया था। वह तपस्या कर रहा था। उससे परम विनयी होकर उसने यह वाक्य कहा था ।५४। शम्भु प्रभु आप को देखने की इच्छा करते हैं। उनकी आज्ञा से भृगुवर्य आपके समीप में मैं आया हूँ। सो अब आप उनके चरणों की सन्निधि में चलिए ।५५। भार्गव ने उस महोदर के इस वचन का श्रवण करके वह बहुत शीघ्र उठकर खड़ा हो गया था। भगवान् शम्भु की आज्ञा को शिर पर धारण करके उस आदेश का अभिनन्दन करते हुए मैं अभी चलता हूँ—यह उसको राम ने उत्तर दिया था ।५६।

ततो रामं त्वरोपेतः शम्भुपार्श्वं महोदरः । प्रापयामास सहसा कैलासे नागसत्तमे ॥५७ सहितं सकलैर्भूतैरिन्द्राद्यैश्च सहामरैः । ददर्श भार्गवश्रेष्ठः शंकरं भक्तवत्सलम् ॥५८ संस्तूयमानं मुनिभिर्नारदाद्यैस्तपोधनैः । गंधर्वेरुपगायद्भिर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥५९ उपास्यमानं देवेशं गजचर्मधृताम्बरम् । भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥६०

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६५

धृतपिंगजटाभारं नागाभरणभूषितम् ।
प्रलम्बोष्ठभुजं सौम्यं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ॥६१॥
आस्थितं काञ्चने पट्टे गीर्वाणसमितौ नृप ।
उपासर्पत्त देवेशं भृगुवर्यः कृतांजलिः ॥६२॥
श्रीकण्ठदर्शनोद्भूतरोमांचांचितविग्रहः ।
बाष्पात्तु सिक्तकायेन स तु गत्वा हरांतिकम् ॥६३॥

इसके पश्चात् महोदर ने राम को बहुत ही शीघ्रतासे शम्भु के समीप में प्राप्त कर दिया था और सहसा कैलास पर्वत के परम श्रेष्ठ भाग में दिया था ।५७। वहाँ पर भार्गव ने समस्त भूत और इन्द्र आदि देवों के सहित भक्त वत्सल शंकर का दर्शन किया था ।५८। वहाँ पर भार्गव ने देखा था कि बड़े-बड़े तपोधन नारद आदि मुनिगण उनका संस्तवन कर रहे थे—गन्धर्वगण गान अर्थात् भगवान् के गुणों का गायन कर रहे थे तथा अप्सरा-उनके मनोविनोद के लिए समक्ष में नृत्य कर रही थीं ।५९। सभी जन वहाँ पर देवेश्वर की उपासना में संलग्न थे । शम्भु गज के चर्म को धारण किये हुए थे और उनके समस्त अङ्गों में भस्म लगी हुई थी जिससे उनका शरीर धूलित हो रहा था । तीन नेत्रों के धारण करने वाले शिव के मस्तक में चन्द्रमा विराजमान था ।६०। भगवान् पिङ्गल वर्ण की जटाजूट का भार शिर पर धारण किये हुए थे और नागों के आभरणों से उनके अङ्ग विभूषित थे । उनका वपु परम सौम्य था तथा उनके ओष्ठ और भुजाएँ लम्बी थी और उनका मुख कमल प्रसन्नता से खिला हुआ था ।६१। हे नृप ! उस देवों की परिषद में शम्भु सुवर्ण के पट्ट पर विराजमान थे । हाथ जोड़े हुए राम देवेश्वर के समीप में प्राप्त हुआ था ।६२। भगवान् श्री कण्ठ के दर्शन से आह्लादातिरेक से राम का सम्पूर्ण शरीर रोमाञ्चित हो गया था और आनन्दाश्रुओं से उसका शरीर सिक्त हो गया था । ऐसी दशा में परमानन्दित होते हुए राम भगवान् शम्भु के समीप में उपस्थित हुआ था ।६३।

भक्त्या ससंभ्रमं वाचा हर्षगद्गदयासकृत् ।
नमस्ते देवदेवेति व्यालपन्नाकुलाक्षरम् ॥६४॥
पपात संस्पृशन्मूर्ध्ना चरणौ पुरविद्विषः ।
पश्यतां देववृन्दानां मध्ये भृगुकुलोद्वहम् ॥६५॥

१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तमुत्थाप्य शिवः प्रीतः प्रसन्नमुखपंकजम् । रामं मधुरया वाचा प्रहसन्नाह सादरम् ॥६६॥ इमे दैत्यगणैः क्रांताः स्वाधिष्ठानात्परिच्युताः । अशक्नुवंतस्तान्हंतुं गीर्वाणा मामुपागताः ॥६७॥ तस्मान्ममाज्ञया राम देवानां च प्रियेप्सया । जहि दैत्यगणान्सर्वान्समर्थस्त्वं हि मे मतः ॥६८॥ ततो रामोऽब्रवीच्छ्रवं प्रणिपत्य कृतांजलिः । शृण्वतां सर्वदेवानां सप्रश्रयमिदं वचः ॥६९॥ स्वामिन्न विदितं किं ते सर्वज्ञस्याखिलात्मनः । तथापि विज्ञापयतो वचनं मेऽवधारय ॥७०॥

भक्ति भाव से सम्भ्रम के साथ हर्ष से गद्गद वाणी के द्वारा व्याकुल अक्षरों में शम्भु से बोले—हे देवदेव ! आपके लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ।६४। भगवान् त्रिपुरारि प्रभु के चरण कमलों को मस्तक से स्पर्श करते हुए उसने भूमि पतित होकर साष्टांग प्रणिपात किया था । समस्त देवों के समुदाय वहाँ पर देख रहे थे । उनके मध्य में उस भृगु कुलोद्वह ने प्रणिपात किया था ।६५। भगवान् शिव ने परम प्रसन्न होकर विकसित मुखकमल वाले उस राम को उठाया था और हँसते हुए परम मधुर वाणी से आदर पूर्वक राम से कहा था ।६६। ये सब देवों के समुदाय दैत्यों के द्वारा समाक्रान्त हो रहे हैं और ये सब अपने निवास स्थान से परिच्युत कर दिये गये हैं। बिचारे ये देवगण उनका हनन करने की सामर्थ्य न रखते हुए ही इस समय मेरे समीप में समागत हुए हैं ।६७। इसलिए हे राम ! मेरी आज्ञा से और सब देवों के प्रिय कार्य करने की इच्छा से समस्त दैत्यगणों का आप हनन कर डालिए । आप इस कार्य के सम्पादन करने के लिए समर्थ हैं ऐसा मेरा मत है ।६८। इसके उपरान्त राम ने भगवान् शम्भु को प्रणाम करके दोनों अपने करों को जोड़कर समस्त देवों के सामने उनके श्रवण करते हुए विनय पूर्वक यह वचन भगवान् शम्भु से कहे थे ।६९। हे स्वामिन् ! आप तो सर्वज्ञ हैं और सबकी आत्मा हैं। क्या आपको यह विदित नहीं है तो भी विज्ञापन करते हुए मेरे यह वचन को अब धारण कीजिए ।७०।

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६७

यदि शक्रादिभिर्देवैरखिलैरमरारयः । न शक्या हंतुमेकस्य शक्याः स्युस्ते कथं मम ॥७१॥ अनस्त्रज्ञोऽस्मि देवेश युद्धानामप्यकोविदः । कथं हनिष्ये सकलान्सुरशत्रूननायुधः ॥७२ इत्युक्तस्तेन देवेशः सितं कालाग्निसप्रभम् । शैवमस्त्रमयं तेजो ददौ तस्मै महात्मने ॥७३ आत्मीयं परशुं दत्त्वा सर्वशस्त्राभिभावकम् । राममाह प्रसन्नात्मा गीर्वाणानां तु शृण्वताम् ॥७४ मत्प्रसादेन सकलान्सुरशत्रून्वनिघ्नतः । शक्तिर्भवतु ते सौम्य समस्तारिदुरासदा ॥७५ अनेनैवायुधेन त्वं गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः । स्वयमेव च वेत्सि त्वं यथावद्युद्धकौशलम् ॥७६ वसिष्ठ उवाच—एवमुक्तस्ततो रामः शंभुना तं प्रणम्य च । जग्राह परशुं शैवं विबुधारिवधोद्यतः ॥७७

यदि इन्द्र आदि समस्त देवों के द्वारा देवों के शत्रुगण दैत्य लोग मारे नहीं जाते हैं तो मुझ एक के द्वारा वे सब कैसे मारे जा सकते हैं ॥७१॥ हे देवेश ! मैं तो अस्त्रों के विषय में भी अज्ञ हूँ और युद्धों के करने में भी पण्डित नहीं हूँ । बिना ही आयुधों वाला मैं किस तरह से समस्त देवों के शत्रु असुरों का अकेला हनन करूँगा ॥७२। उस राम के द्वारा इस रीति से कहे गये देवेश्वर शम्भु ने कालाग्नि के समान प्रभा वाले सित अब अस्त्रों से परिपूर्ण शैव तेज उस महान आत्मा वाले को दे दिया था ॥७३। उन्होंने सब शस्त्रों के अभिभावक अपने परशु को प्रदान कर प्रसन्न आत्मा वाले शिव ने समस्त देवगणों के सुनते हुए उस राम से कहा था ॥७४। हे सौम्य ! मेरे प्रसाद से समस्त देवों के शत्रुओं का हनन करते हुए तुम्हारे अन्दर ऐसी ही शक्ति हो जावेगी जो सब अरिओं को दुरासद अर्थात् अतीव असह्य होगी ॥७५। इसी एक मात्र आयुध को ग्रहण कर तुम चले जाओ और सब शत्रुओं के साथ युद्ध करो । तुम अपने ही आप स्वयं यथा रीति से युद्ध करने के कौशल को जान जाओगे ॥७६। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस तरह से जब भगवान्

१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिव के द्वारा राम से कहा गया तो उसने शम्भु को प्रणाम किया था और देवों के शत्रुओं के वध करने के लिये उद्यत होते हुए उस परशु का ग्रहण कर लिया था ।७७।

ततः स शुशुभे रामो विष्णुतेजोंऽशसंभवः ।
रुद्रभक्त्या समायुक्तो द्युत्येव सवितुर्महः ॥७८
सोऽनुज्ञातस्त्रिनेत्रेण देवैः सर्वैः समन्वितः ।
जगाम हंतुमसुरान्युद्धाय कृतनिश्चयः ॥७९
ततोऽभवत्पुनर्युद्धं देवानामसुरैः सह ।
त्रैलोक्यविजयोद्युक्तैराजन्यतिभयंकरम् ॥८०
अथ रामो महाबाहुस्तस्मिन्युद्धे सुदारुणे ।
क्रुद्धः परशुना तेन निजघान महासुरान् ॥८१
प्रहारैरशनिप्रख्यैर्निघ्नन्दैत्यान्सहस्रशः ।
चचार समरे रामः क्रुद्धः काल इवापरः ॥८२
हत्वा तु सकलान्दैत्यान्देवान्सर्वानहर्षयत् ।
क्षणेन नाशयामास रामः प्रहरतां वरः ॥८३
रामेण हन्यमानास्तु समस्ता दैत्यदानवाः ।
ददृशुः सर्वतो रामं हतशेषा भयान्विताः ॥८४
हतेष्वसुरसंघेषु विद्रुतेषु च कृत्स्नशः ।
राममामंत्र्य विबुधाः प्रययुस्त्रिदिवं पुनः ॥८५
रामोऽपि हत्वा दितिजानभ्यनुज्ञाप्यचामरान् ।
स्वमाश्रमं समापेदे तपस्यासक्तमानसः ॥८६
मृगव्याधप्रतिकृतिं कृत्वा शम्भोर्महामतिः ।
भक्त्या संपूजयामास स तस्मिन्नाश्रमे वशी ॥८७
गन्धैः पुष्पैस्तथा हृद्यैर्नैवेद्यैरभिवन्दनैः ।
स्तोत्रैश्च विधिवद्भक्त्या परां प्रीतिमुपानयत् ॥८८

इसके अनन्तर भगवान् विष्णु के तेज के अंश से समुत्पन्न वह राम

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १६६

बहुत ही शोभा युक्त हो गया था जो कि रुद्र की शक्ति से समन्वित था। वह सूर्य की द्युति से दिन के ही समान देदीप्यमान हो गया था।७८। वह राम त्रिनेत्र प्रभु के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त कर सब देवों के साथ हो युद्ध करने के लिए निश्चय करते हुए असुरों के हनन को वहाँ से चल दिया था।७६। हे राजन् ! इसके पश्चात् सम्पूर्ण त्रैलोक्य के विजय करने के लिए समुद्यत उन असुरों के साथ देवगणों का महान भयङ्कर युद्ध फिर हुआ था।८०। इसके उपरान्त महान बाहुओं वाले राम ने उस महान दारुण युद्ध में क्रुद्ध होकर उसी परशु से बड़े-बड़े असुरों का हनन किया था।८१। वज्र के सदृश प्रहारों से सहस्रों दैत्यों का संहार करते हुए राम ने परम क्रोधित होकर दूसरे काल के ही समान उस युद्ध क्षेत्र में सञ्चरण किया था।८२। प्रहार करने वालों में परम श्रेष्ठ राम ने समस्त दैत्यों का हनन करके एक ही क्षण में सुर शत्रुओं का नाश कर दिया था और देवों को परम हर्षित कर दिया था।८३। राम के द्वारा मारे जाते हुए सब दैत्यों और दानवों ने जो भी कुछ मरने से बच गये थे बहुत भय से युक्त होकर सभी ओर राम को ही देख रहे थे।८४। समस्त असुरों के समुदायों के निहत हो जाने पर और वहाँ से पूर्णतया सबके भाग जाने पर देवगणों ने राम को आमन्त्रित किया था और वे सब फिर स्वर्गलोक को चले गये थे।८५। राम भी दैत्यों का पूर्णतया निहनन करके सब देवों की अनुज्ञा प्राप्त करके तपश्चर्या में आसक्त मन वाले होते हुए अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे।८६। उस महामति राम ने भगवान् शम्भु की मृगों के हनन करने वाले व्याध की ही प्रतिमूर्ति बनाकर उस वशी ने उसी आश्रम में बहुत ही भक्ति के भाव से उसकी पूजा की थी।८७। पूजन पुष्प-गन्ध-सुन्दर नैवेद्य-अभिनन्दन और स्तोत्रों के द्वारा विधि पूर्वक किया गया था और परमाधिक प्रीति की प्राप्ति का थी।८८।

—X—

॥ परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ॥

वसिष्ठ उवाच ततस्तद्भक्तियोगेन स प्रीतात्मा जगत्पतिः ।
प्रत्यक्षमगमत्तस्य सर्वैः सह मरुद्गणैः ॥१
तं दृष्ट्वा देवदेवेशं त्रिनेत्रं चंद्रशेखरम् ।
वृषैवाहनं शम्भुं भूतकोटिसमन्वितम् ॥२
ससंभ्रमं समुत्थाय हर्षेणाकुललोचनः ।

१७० । [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रणाममकरोद्भक्तया शर्वाय भुवि भार्गवः ॥३ उत्थायोत्थाय देवेशं प्रणम्य शिरसासकृत् । कृतांजलिपुटो रामस्तुष्टाव च जगत्पतिम् ॥४ राम उवाच-नमस्ते देवदेवेश नमस्ते परमेश्वर । नमस्ते जगतो नाथ नमस्ते त्रिपुरान्तक ॥५ नमस्ते सकलाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल । नमस्ते सर्वभूतेश नमस्ते वृषभध्वज ॥६ नमस्ते सकलाधीश नमस्ते करुणाकर । नमस्ते सकलावास नमस्ते नीललोहि ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर उसकी भक्ति भाव से प्रसन्न आत्मा वाले जगत् के स्वामी समस्त मरुद्गणों के सहित उसके समक्ष में प्रत्यक्ष रूप में हो गये थे ।१। तीन नेत्रों के धारण करने वाले चन्द्रशेखर और वृषभेन्द्र के वाहन वाले और करोड़ों भूतगणों से समन्वित देवों के भी देवेश्वर भगवान् शम्भु का राम ने दर्शन किया था ।२। शम्भु का दर्शन प्राप्त होते ही अत्यन्त हर्ष से समाकुलित लोचनों वाले राम ने सम्भ्रम के साथ उठकर (उस भार्गव ने) भूमि में पड़कर भक्तिभाव से भगवान् शर्व के लिए प्रणाम किया था।३। बारम्बार उठ उठकर शिर के बल से अनेक बार प्रणाम करके उन जगत् के स्वामी देवेश्वर को हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की थी ।४। राम ने कहा—हे परमेश्वर ! आप तो देवों के भी देव हैं। आपकी सेवा में मेरा बार-बार प्रणिपात है। आप तो जगत् के नाथ हैं। हे त्रिपुरासुर के हनन करने वाले ! आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।५। हे भक्तों पर प्यार करने वाले ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व के अध्यक्ष हैं। आपकी सेवा में मेरा अनेक बार प्रणाम स्वीकृत होवे । हे सब भूतों के स्वामिन् ! हे वृषभध्वज ! आपके लिए मेरा प्रणाम है ।६। हे करुणानिधि ! आप तो सबके अधीश हैं। हे नील लोहित ! आप सबमें निवास करने वाले हैं। आपकी चरण-सेवा में मेरा बारम्बार प्रणिपात स्वीकार होवे ।७।

नमः सकलदेवारिगणनाशाय शूलिने । कपालिने नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकपालिने ॥८