संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विचित्रार्थपदौदार्यगुणगाम्भीर्यजातिभिः । सर्वज्ञस्येव ते वाणी श्रूयतेऽतिमनोहरा ॥३ इन्द्रो वह्निर्यमो धाता वरुणो वा धनाधिपः । ईशानस्तपनो ब्रह्मा वायुः सोमो गुरुर्गुहः ॥४ एषामन्यतमः प्रायो भवान्भवितुमर्हति । अनुभावेन जातिस्ते हृदि शंकां तनोति मे ॥५ मायावी भगवान्विष्णुः श्रूयते पुरुषोत्तमः । को वा त्वं वपुषानेन ब्रूहि मां समुपागतः ॥६ अथ वा जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः । परमात्मात्मसंभूतिरात्मारामः सनातनः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा-हे भूपाल ! मतिमानों में परम श्रेष्ठ राम से जब इस प्रकार से कहा गया था तो फिर उसने मन से निरूपण करके बहुत ही विस्मित होते हुए उससे कहा था ।१। राम ने कहा—हे महान् भाग वाले ! आप मुझे यह बतलाइए कि आप कौन हैं ? आप कोई प्राकृत पुरुष तो हैं नहीं । आपका शरीर तो अनुभाव से इन्द्र के ही समान लक्षित हो रहा है ।२। विचित्र अर्थ वाले पदों की उदारता-गुणों की गम्भीरता की जातियों से आपकी वाणी सर्वज्ञ की ही अधिक मनोहर सुनाई दे रही है ।३। आप या तो इन्द्र हैं—अग्निदेव हैं—यम-धाता—वरुण अथवा कुबेर हैं । आप या तो ईशान है—तपन-ब्रह्मा-वायु-सोम-गुरु और या गुह हैं ।४। इन ऊपर बताये हुओं में से ही आप कोई से भी एक हो सकते हैं—यही बहुधा प्रतीत होता है । आपके अनुभाव कुछ ऐसे ही हैं कि मेरे हृदय में आपकी जाति बड़ी भारी शंका उत्पन्न कर रही है ।५। भगवान् विष्णु बहुत अधिक मायावी हैं—ऐसा पुरुषोत्तम प्रभु के विषय में श्रवण किया जाता है । आप वास्तव में कौन हैं जो कि इस शरीर को धारण करके यहाँ समागत हुए हैं—यह आप मुझे स्पष्टतया बतलाने की कृपा करें । अथवा समस्त भुवनों के स्वामी—सब कुछ के ज्ञाता साक्षात् परमेश्वर हैं जो परमात्मा से ही आत्मा की उत्पत्ति वाले सनातन आत्माराम हैं ।६-७।
स्वच्छन्दचारी भगवाञ्छिवः सर्वजगन्मयः । वपुषानेन संयुक्तो भवान्भवितुमर्हति ॥८