भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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शैवशास्त्र की प्राप्ति ] [ १५७

नान्यस्येदृग्भवेल्लोके प्रभावानुगतं वपुः ।
जात्यर्थसौष्ठवोपेतः वाणी चौदार्यशालिनी ॥६
मन्येऽहं भक्तवात्सल्याद्नानेन वपुषा हरः ।
प्रत्यक्षतामुपगतो संदेहोऽस्मत्परीक्षया ॥१०
न केवलं भवान् व्याधस्तेषां नेदृग्विधाकृतिः ।
तस्मात्तुभ्यं नमस्तस्मै सुरूपं संप्रदर्शय ॥११
आविष्कुर्वन्प्रसीदात्ममहिमानुगुणं वपुः ।
ममानेकविधा शंका मुच्येत येन मानसी ॥१२
प्रसीद सर्वभावेन बुद्धिमोहो ममाधुना ।
प्रणाशय स्वरूपस्य ग्रहणादेव केवलम् ॥१३
प्रार्थये त्वां महाभाग प्रणम्य शिरसासकृत् ।
कस्त्वं मे दर्शयात्मानं बद्धोऽयं ते मयाञ्जलिः ॥१४

परम स्वच्छन्दता के साथ सञ्चरण करने वाले सम्पूर्ण जगत् के स्वरूप वाले आप साक्षात् भगवान् शिव हैं जो इस शबर के शरीर को धारण करके यहाँ पर स्थित हैं। मुझे तो ऐसा ही लगता है कि आप भग-वान् शम्भु हो सकते हैं ।८। इस लोक में अन्य किसी का भी ऐसा प्रभाव से अनुगत शरीर नहीं होता है। जाति का अर्थ के सौष्ठव से युक्त और उदा-रता की शोभा वाली आपकी वाणी है ।६। मैं तो अब ऐसा ही समझ रहा हूँ कि भगवान् हर ही भक्त के ऊपर वात्सल्य होने के कारण से इस शरीर को धारण कर मेरी परीक्षा करने के लिए प्रत्यक्ष स्वरूप में उपागत हुए हैं-ऐसा ही कुछ सन्देह होता है ।१०। आप केवल व्याध तो नहीं हैं—यह निश्चय है क्योंकि इस प्रकार की आकृति कभी होती ही नहीं है। इस कारण से मेरा आपकी सेवा में प्रणाम निवेदित है। अब कृपया अपना वास्तविक स्वरूप प्रदर्शित कीजिए ।११। मेरे ऊपर प्रसन्न होइए और अपनी महिमा के अनुरूप वपु को प्रकट कर दीजिए जिससे मेरे मन में जो अनेक तरह की शङ्काएँ उठ रही हैं, उनसे मेरा छुटकारा हो जावे ।१२। आप पूर्ण रूप से प्रसन्न होइए और इस समय में जो विचलित बुद्धि हो रही है तथा उसके कारण जो मुझे महान् मोह उत्पन्न हो रहा है उसका विनाश कीजिए। यह केवल आपके सत्य स्वरूप के ग्रहण करने ही से हो जायगा