संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१३। हे महाभाग ! मेरी यह विनम्र प्रार्थना है और मैं बारम्बार आपको शिर से प्रणाम करके आपसे विनती करता हूँ कि आप कौन हैं--मुझे अपना सत्य स्वरूप दिखला दीजिए-मैं आपके लिए दोनों हाथ को जोड़कर विनय कर रहा हूँ ।१४।
इत्युक्त्वा तं महाभाग ज्ञातुमिच्छन्भृगूद्वहः । उपविश्य ततो भूमौ ध्यानमास्ते समाहितः ॥१५ बद्धपद्मासनो मौनी यतवाक्कायमानसः । निरुद्धप्राणसंचारों दध्यौ चिरमुदारधीः ॥१६ सन्नियम्येंद्रियग्रामं मनो हृदि निरुध्य च । चिंतयामास देवेशं ध्यादृष्ट्या जगद्गुरुम् ॥१७ अपश्यच्च जगन्नाथमात्मसंधानचक्षुषा । स्वभक्तानुग्रहकरं मृगव्याधस्वरूपिणम् ॥१८ तत उन्मील्य नयने शीघ्रमुत्थाय भार्गवः । ददर्श देवं तेनैव वपुषा पुरतः स्थितम् ॥१९ आत्मनोऽनुग्रहार्थाय शरण्यं भक्तवत्सलम् । आविर्भूतं महाराज दृष्ट्वा रामः ससंभ्रमम् ॥२० रोमाञ्चोद्भिन्नसर्वांगो हर्षाश्रुप्लुतलोचनः । पपात पादयोर्भूमौ भक्त्या तस्य महामतिः ॥२१
हे महाभाग ! उस शबर के वेषधारी से यह इतना कहकर उस भृगूद्वह ने सत्य स्वरूप के ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा करते हुए भूमि पर बैठकर वह परम समाहित होकर ध्यान में संलग्न हो गया था ।१५। उस उदार बुद्धि वाले ने पद्मासन बाँध लिया था और मौन होकर वाणी-शरीर और मन को संयत कर लिया था । फिर उसने प्राण वायु के सञ्चार का निरोध करके चिरकाल पर्यन्त ध्यान लगा लिया था ।१६। इन्द्रियों के समूह को भली भांति नियमित करके हृदय में मन को निरुद्ध कर लिया और फिर ध्यान की ही दृष्टि से जगद्गुरु देवेश्वर का चिन्तन किया था ।१७। और फिर आत्म सन्धान की चक्षु से उन जगतों के स्वामी-अपने भक्तों पर परम अनुग्रह करने वाले को मृगों के शिकारी व्याध के स्वरूप को धारण करने