संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वाले को देखा था।१८। इसके अनन्तर अपनी आंखें खोलकर भार्गव ने शीघ्र उठकर उसी शरीरसे संयुक्त और सामने स्थित देव का दर्शन किया था ।१६। हे महाराज ! अपने ऊपर अनुग्रह करने के लिए-भक्तो पर प्रेम करने वाले तथा शरण में समागत के रक्षक देवेश्वर को राम ने बड़े सम्भ्रम के साथ प्रकट हुए देखा था ।२०। उस महामति के अङ्गों में रोमाञ्च उद्भिन्न हो गये थे और परमाधिक हर्ष के उद्वेक से आनन्दाश्रुओं से नेत्र भर गये थे । फिर भक्तिभाव से वह उनके चरणों में भूमि पर उनके सामने गिर गया था अर्थात् उसने उनके चरण कमलों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया था ।२१।
स गद्गदमुवार्चनं संभ्रमाकुलया गिरा ।
शरणं भव शर्वेति शंकरेत्यसकृन्नृप ॥२२
ततः स्वरूपधृक् शंभुस्तद्भक्तिपरितोषितः ।
राममुत्थापयामास प्रणामावनतं भुवि ॥२३
उत्थापितो जगद्धात्रा स्वहस्ताभ्यां भृगूद्वहः ।
तुष्टाव देवदेवेशं पुरः स्थित्वा कृतांजलिः ॥२४
राम उवाच—नमस्ते देवदेवाय शंकरायादिमूर्त्तये ।
नमः शर्वाय शांतय शाश्वताय नमोनमः ॥२५
नमस्ते नीलकण्ठाय नीललोहितमूर्त्तये ।
नमस्ते भूतनाथाय भूतवासाय ते नमः ॥२६
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय महादेवाय मीढुषे ।
शिवाय बहुरूपाय त्रिनेत्राय नमोनमः ॥२७
शरणं भव मे शर्व त्वद्भक्तस्य जगत्पते ।
भूयोऽनन्याश्रयाणां तु त्वमेव हि परायणम् ॥२८
हे नृप ! उस राम ने सम्भ्रम से समाकुलित वाणी से गद्गद कण्ठ होकर इन प्रभु से कहा था और बारम्बार हे सर्व ! आप मेरे रक्षक होइए ऐसी प्रार्थना की थी ।२२। इसके अनन्तर अपने स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु ने राम की भक्ति के भाव से परम सन्तुष्ट होते हुए भूमि में प्रणाम करने में पड़े हुए उसको ऊपर अपने कर कमलों से उठा लिया था ।२३। जगत् के धाता के द्वारा अपने ही करों से वह भृगूद्वह ऊपर उठा लिया गया