भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था। फिर उस राम ने उनके समक्ष में स्थित होकर हाथ जोड़कर उन देव-देवेश्वर का स्तवन किया था ।२४। राम ने कहा—देवों के भी देव आदि मूर्ति भगवान् शङ्कर के लिये मेरा प्रणाम स्वीकार हो । शर्वे—परमशान्त और शाश्वत प्रभु शम्भु के लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।२५। नीलकण्ठ और नील-लोहित मूर्ति वाले के लिए मेरा अनेक बार प्रणाम निवेदित है । आप तो भूतों के नाथ हैं ऐसे भूतवास आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।२६। आपका स्वरूप व्यक्त है और अव्यक्त भी है ऐसे महादेव—मीढु—शिव—त्रिनेत्र और अनेक रूप वाले देवेश की सेवा में मेरा बारम्बार प्रणाम स्वीकार हो ।२७। हे जगत् के स्वामिन् ! हे शर्व ! आपके ही चरणों में भक्ति रखने वाले मेरे आप रक्षक हो जाइए । जो किसी अन्य देव का समाश्रय ग्रहण न कर आपके ही चरणों का आश्रय लेते हैं वे अनन्य भक्त होते हैं उनके लिए आप ही परायण हैं ।२८।

यन्मयाऽपकृतं देव दुरुक्तं वापि शंकर ।
अजानता त्वां भगवन्मम तत्क्षंतुमर्हसि ।।२९
अनन्यवेद्यरूपस्य सद्भावमिह कः पुमान् ।
त्वामृते तव सर्वेश सम्यक् शक्नोति वेदितुम् ।।३०
तस्मात्त्वं सर्वभावेन प्रसीद मम शंकर ।
नान्यास्ति मे गतिस्तुभ्यं नमो भूयो नमो नमः ।।३१
वसिष्ठ उवाच—इति संस्तूयमानस्तु कृतांजलिपुटं पुरः ।
तिष्ठंतमाह भगवान्प्रसन्नात्मा जगन्मयः ।।३२
भगवानुवाच—प्रीतोऽस्मि भवते तात तपसाऽनेन सांप्रतम् ।
भक्त्या चैवानपायिन्या ह्यपि भार्गवसत्तम ।।३३
दास्ये चाभिमतं सर्वं भवतेऽहं त्वया वृतम् ।
भक्तो हि मे त्वमत्यर्थं नात्र कार्या विचारणा ।।३४
मयैवावगतं सर्वं हृदि यत्तेऽद्य वर्त्तते ।
तस्माद्ब्रवीमि यत्त्वाहं तत्कुरुष्वाविशंकितम् ।।३५

हे शङ्कर ! मैंने जो भी कुछ अपकार किया है अथवा आपके प्रति मैंने जो बुरे शब्दों का प्रयोग किया था वह मेरे अज्ञान के कारण से ऐसा