संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हुआ था क्योंकि मैं आपको जान नहीं पाया था। उस सबको आप क्षमा करने के योग्य होते हैं।२६। अनन्य वेद्य रूप वाले आपके सद्भाव को कौन-सा पुरुष हे सर्वेश ! और आपको भले प्रकार से जान सकता है अर्थात् कोई भी नहीं जानता है ।३०। हे शङ्कर ! इस कारण से आप सर्वभाव से मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाइए। आपके बिना मेरी अन्य कोई भी गति नहीं है अर्थात् मेरा उद्धार केवल आप ही कर सकते हैं अतएव आपके लिए मेरा पुनः बारम्बार नमस्कार है ।३१। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से सामने स्थित होकर दोनों करों को जोड़े हुए वह स्तुति कर रहा था। जगन्मय प्रसन्न आत्मा वाले भगवान् ने उससे कहा था ।३२। भगवान् ने कहा—हे तात ! अब आपकी इस तपश्चर्या से आपके ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। हे भार्गवों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपकी अनपायिनी भक्ति से अत्यधिक प्रसन्न हूँ ।३३। जो भी आपने अपने मन में विचार रखा है वह सभी कुछ मैं आपको दे रहा दूँगा। आप मेरे बहुत ही अधिक प्रिय भक्त हैं—इसमें कुछ भी संशय वाली बात नहीं है ।३४। इस समय में जो भी कुछ आपके हृदय में है वह मुझे सभी अवगत है अर्थात् उस सबको मैं भली भाँति जानता हूँ। इसी कारण से मैं आपको बतलाता हूँ और आप कोई भी विशेष शङ्का न रखते हुए वही करिए ।३५।
नास्त्राणां धारणे वत्स विद्यते शक्तिरद्य ते । रौद्राणां तेन भूयोऽपि तपो घोरं समाचर ॥३६॥
परीत्य पृथिवीं सर्वां सर्वतीर्थेषु च क्रमात् । स्नात्वा पवित्रदेहस्त्वं सर्वाण्यस्त्राण्यवाप्स्यसि ॥३७॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तेनैव वपुषा विभुः । रामस्य पश्यतो राजन्क्षणेन भवभागकृत् ॥३८॥
अंतर्हिते जगन्नाथे रामो नत्वा तु शंकरम् । परीत्य वसुधां सर्वां तीर्थस्नानेऽकरोन्मनः ॥३६॥
ततः स पृथिवीं सर्वां परिक्रम्य यथाक्रमम् । चकार सर्वतीर्थेषु स्नानं विधिवदात्मवान् ॥४०॥
तीर्थेषु क्षेत्रमुख्येषु तथा देवालयेषु च । पितॄन्देवांश्च विधिवदतर्पयदतंद्रितः ॥४१॥