संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 158, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उपवासतपोहोमजपस्नानादिसुक्रियाः । तीर्थेषु विधिवत्कुर्वन्परिचक्राम मेदिनीम् ॥४२
हे वत्स ! आज आपके अन्दर अस्त्रों के धारण करने की शक्ति नहीं है। ये सब रौद्र अस्त्र हैं। इससे आप फिर भी परम घोर तप का समाचरण कीजिए ।३६। इस सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करके क्रम से समस्त तीर्थ स्थलों में स्नान कीजिए। फिर जब आप पवित्र शरीर वाले हो जाँयगे तो आप सभी अस्त्रों को प्राप्त करेंगे ।३७। इतना यह कर देवेश्वर विभु उसी शरीर से वहाँ पर अन्तर्हित हो गये थे। हे राजन् ! राम यह देख ही हो गये थे ।३८। जगत् के स्वामी के अन्तर्हित हो जाने पर राम ने भगवान् शङ्कर को प्रणाम किया था और फिर सम्पूर्ण वसुधा पर भ्रमण करके तीर्थों में स्नान करने का मन में निश्चय किया था ।३९। इसके उपरान्त आत्मवान् उसने क्रमानुसार सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा लगाकर समस्त तीर्थों में विधिविधान के साथ स्नान किया था ।४०। तन्द्रा से रहित होकर उसने मुख्य क्षेत्रों में—तीर्थों में तथा देवालयों में पितृगणों का और देवों का विधि के सहित तर्पण किया था ।४१। उपवास—तप—जप—होम और स्नान आदि की सुन्दर क्रियाएँ तीर्थों में विधिपूर्वक करते हुए उसने पृथ्वी पर परिक्रमण किया था ।३२।
एवं क्रमेण तीर्थेषु स्नात्वा चैव वसुन्धराम् । प्रदक्षिणीकृत्य शनैः शुद्धदेहोऽभवन्नृप ॥४३ परीत्यैवं वसुमतीं भार्गवः शंभुशासनात् । जगाम भूयस्तं देशं यत्र पूर्वमुवास सः ॥४४ गत्वा राजन्स तत्रैव स्थित्वा देवमुमापतिम् । भक्त्या संपूजयामास तपोभिर्नियमैरपि ॥४५ एतस्मिन्नेव काले तु देवानामसुरैः सह । बभूव सुचिरं राजन्संग्रामो रोमहर्षणः ॥४६ ततो देवान्पराजित्य युद्धेऽतिबलिनोऽसुराः । अवापुरमरैश्वर्यमशेषमकुतोभयाः ॥४७ युद्धे पराजिता देवा सकला वासवादयः । शंकरं शरणं जग्मुर्हतैश्वर्या ह्यरातिभिः ॥४८