संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६३
तोषयित्वा जगन्नाथं प्रणामजयसंस्तवैः ।
प्रार्थयामासुरसुरान्हन्तुं देवाः पिनाकिनम् ॥४६॥
हे नृप ! इस प्रकार से क्रम से तीर्थों में स्नान करके और सम्पूर्ण पृथिवी की प्रदक्षिणा करके धीरे-धीरे वह शुद्ध देह वाला हो गया था ॥४३॥ वह भार्गव राम शम्भु भगवान् के शासन से इस रीति से पृथिवी की परिक्रमा देकर फिर वह उसी भू भाग पर पहुँच गया था जहाँ पर कि वह प्रथम समय में निवास करता था ॥४४॥ हे राजन् ! वह वहाँ पर जाकर स्थित हो गया था और तप तथा नियमों के द्वारा भक्ति-भाव से उमा के पति देवेश्वर का भले प्रकार से पूजन किया था ॥४५॥ उसी समय में हे राजन् ! देवों का असुरोंके साथ बहुत समय तक बड़ा ही भीषण रोमहर्षण युद्ध हुआ था ॥४६॥ इसके पश्चात् महान् बलशाली असुरों ने सब देवों को युद्ध में पराजित करके सम्पूर्ण जो देवों का ऐश्वर्य था उसको ग्रहण कर लिया था और फिर वे निर्भीक होकर रहने लगे थे ॥४७॥ उस युद्ध में सब इन्द्र आदि देवगण पराजित हो गये थे और शत्रुओं के द्वारा अपहृत वैभव वाले सब भगवान् शंकर की शरणागति में प्राप्त हुए थे ॥४८॥ उन देवगणों ने जगत के नाथ भगवान पिनाकी को प्रणाम-जय और संस्तवनों के द्वारा प्रसन्न कर लिया था और फिर उन्होंने भगवान् शङ्कर से असुरों के हनन करने के लिए प्रार्थना की थी ॥४६॥
ततस्तेषां प्रतिश्रुत्य दानवानां वधं नृप ।
देवानां वरदः शंभुर्महोदरमुवाच ह ॥५०॥
हिमाद्रेर्दक्षिणे भागे रामो नाम महातपाः ।
मुनिपुत्रोऽतितेजस्वी मामुद्दिश्य तपस्यति ॥५१॥
तत्र गत्वा त्वमद्यैव विवेद्य मम शासनम् ।
महोदर तपस्यंतं तमिहानय माचिरम् ॥५२॥
इत्याज्ञप्तस्तथेत्युक्त्वा प्रणम्येशं महोदरः ।
जगाम वायुवेगेन यत्र रामो व्यवस्थितः ॥५३॥
समासाद्य स तं देशं दृष्ट्वा रामं महामुनिम् ।
तपस्यंतमिदं वाक्यमुवाच विनयान्वितः ॥५४॥