भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्रष्टुमिच्छति शम्भुस्त्वां भृगुवर्यं तदाज्ञया । आगतोऽहं तदागच्छ तत्पादाम्बुजसन्निधिम् ॥५५ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शीघ्रमुत्थाय भार्गवः । तदाज्ञां शिरसानन्द्य तथेति प्रत्यभाषत ॥५६

इसके अनन्तर हे नृप ! उन दानवों के वध के लिए प्रतिज्ञा करके देवों को वरदान प्रदान करने वाले भगवान् शम्भुने महोदर से कहा था ।५०। हिमवान पर्वत के दक्षिण भाग में एक राम नाम वाला महान तपस्वी है। वह मुनि का पुत्र बहुत ही अधिक तेजस्वी है जो कि मेरा ही उद्देश्य लेकर तप करता है ।५१। वहाँ आज ही जाकर तुम मेरे आदेश को उससे कह दो हे महोदर ! उस तपश्चर्या करने वाले को यहाँ पर ले आओ और इस कार्य में विलम्ब मत करो ।५२। इस प्रकार से आज्ञा पाया हुआ वह महोदर—मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर और ईश को प्रणाम करके वायु के समान अति तीव्र वेग से वहाँ पर चला गया था जहाँ पर राम व्यवस्थित था ।५३। उस देश पर पहुँच कर उसने महामुनि राम का दर्शन किया था। वह तपस्या कर रहा था। उससे परम विनयी होकर उसने यह वाक्य कहा था ।५४। शम्भु प्रभु आप को देखने की इच्छा करते हैं। उनकी आज्ञा से भृगुवर्य आपके समीप में मैं आया हूँ। सो अब आप उनके चरणों की सन्निधि में चलिए ।५५। भार्गव ने उस महोदर के इस वचन का श्रवण करके वह बहुत शीघ्र उठकर खड़ा हो गया था। भगवान् शम्भु की आज्ञा को शिर पर धारण करके उस आदेश का अभिनन्दन करते हुए मैं अभी चलता हूँ—यह उसको राम ने उत्तर दिया था ।५६।

ततो रामं त्वरोपेतः शम्भुपार्श्वं महोदरः । प्रापयामास सहसा कैलासे नागसत्तमे ॥५७ सहितं सकलैर्भूतैरिन्द्राद्यैश्च सहामरैः । ददर्श भार्गवश्रेष्ठः शंकरं भक्तवत्सलम् ॥५८ संस्तूयमानं मुनिभिर्नारदाद्यैस्तपोधनैः । गंधर्वेरुपगायद्भिर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥५९ उपास्यमानं देवेशं गजचर्मधृताम्बरम् । भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥६०