संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६५
धृतपिंगजटाभारं नागाभरणभूषितम् ।
प्रलम्बोष्ठभुजं सौम्यं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ॥६१॥
आस्थितं काञ्चने पट्टे गीर्वाणसमितौ नृप ।
उपासर्पत्त देवेशं भृगुवर्यः कृतांजलिः ॥६२॥
श्रीकण्ठदर्शनोद्भूतरोमांचांचितविग्रहः ।
बाष्पात्तु सिक्तकायेन स तु गत्वा हरांतिकम् ॥६३॥
इसके पश्चात् महोदर ने राम को बहुत ही शीघ्रतासे शम्भु के समीप में प्राप्त कर दिया था और सहसा कैलास पर्वत के परम श्रेष्ठ भाग में दिया था ।५७। वहाँ पर भार्गव ने समस्त भूत और इन्द्र आदि देवों के सहित भक्त वत्सल शंकर का दर्शन किया था ।५८। वहाँ पर भार्गव ने देखा था कि बड़े-बड़े तपोधन नारद आदि मुनिगण उनका संस्तवन कर रहे थे—गन्धर्वगण गान अर्थात् भगवान् के गुणों का गायन कर रहे थे तथा अप्सरा-उनके मनोविनोद के लिए समक्ष में नृत्य कर रही थीं ।५९। सभी जन वहाँ पर देवेश्वर की उपासना में संलग्न थे । शम्भु गज के चर्म को धारण किये हुए थे और उनके समस्त अङ्गों में भस्म लगी हुई थी जिससे उनका शरीर धूलित हो रहा था । तीन नेत्रों के धारण करने वाले शिव के मस्तक में चन्द्रमा विराजमान था ।६०। भगवान् पिङ्गल वर्ण की जटाजूट का भार शिर पर धारण किये हुए थे और नागों के आभरणों से उनके अङ्ग विभूषित थे । उनका वपु परम सौम्य था तथा उनके ओष्ठ और भुजाएँ लम्बी थी और उनका मुख कमल प्रसन्नता से खिला हुआ था ।६१। हे नृप ! उस देवों की परिषद में शम्भु सुवर्ण के पट्ट पर विराजमान थे । हाथ जोड़े हुए राम देवेश्वर के समीप में प्राप्त हुआ था ।६२। भगवान् श्री कण्ठ के दर्शन से आह्लादातिरेक से राम का सम्पूर्ण शरीर रोमाञ्चित हो गया था और आनन्दाश्रुओं से उसका शरीर सिक्त हो गया था । ऐसी दशा में परमानन्दित होते हुए राम भगवान् शम्भु के समीप में उपस्थित हुआ था ।६३।
भक्त्या ससंभ्रमं वाचा हर्षगद्गदयासकृत् ।
नमस्ते देवदेवेति व्यालपन्नाकुलाक्षरम् ॥६४॥
पपात संस्पृशन्मूर्ध्ना चरणौ पुरविद्विषः ।
पश्यतां देववृन्दानां मध्ये भृगुकुलोद्वहम् ॥६५॥