संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तमुत्थाप्य शिवः प्रीतः प्रसन्नमुखपंकजम् । रामं मधुरया वाचा प्रहसन्नाह सादरम् ॥६६॥ इमे दैत्यगणैः क्रांताः स्वाधिष्ठानात्परिच्युताः । अशक्नुवंतस्तान्हंतुं गीर्वाणा मामुपागताः ॥६७॥ तस्मान्ममाज्ञया राम देवानां च प्रियेप्सया । जहि दैत्यगणान्सर्वान्समर्थस्त्वं हि मे मतः ॥६८॥ ततो रामोऽब्रवीच्छ्रवं प्रणिपत्य कृतांजलिः । शृण्वतां सर्वदेवानां सप्रश्रयमिदं वचः ॥६९॥ स्वामिन्न विदितं किं ते सर्वज्ञस्याखिलात्मनः । तथापि विज्ञापयतो वचनं मेऽवधारय ॥७०॥
भक्ति भाव से सम्भ्रम के साथ हर्ष से गद्गद वाणी के द्वारा व्याकुल अक्षरों में शम्भु से बोले—हे देवदेव ! आपके लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ।६४। भगवान् त्रिपुरारि प्रभु के चरण कमलों को मस्तक से स्पर्श करते हुए उसने भूमि पतित होकर साष्टांग प्रणिपात किया था । समस्त देवों के समुदाय वहाँ पर देख रहे थे । उनके मध्य में उस भृगु कुलोद्वह ने प्रणिपात किया था ।६५। भगवान् शिव ने परम प्रसन्न होकर विकसित मुखकमल वाले उस राम को उठाया था और हँसते हुए परम मधुर वाणी से आदर पूर्वक राम से कहा था ।६६। ये सब देवों के समुदाय दैत्यों के द्वारा समाक्रान्त हो रहे हैं और ये सब अपने निवास स्थान से परिच्युत कर दिये गये हैं। बिचारे ये देवगण उनका हनन करने की सामर्थ्य न रखते हुए ही इस समय मेरे समीप में समागत हुए हैं ।६७। इसलिए हे राम ! मेरी आज्ञा से और सब देवों के प्रिय कार्य करने की इच्छा से समस्त दैत्यगणों का आप हनन कर डालिए । आप इस कार्य के सम्पादन करने के लिए समर्थ हैं ऐसा मेरा मत है ।६८। इसके उपरान्त राम ने भगवान् शम्भु को प्रणाम करके दोनों अपने करों को जोड़कर समस्त देवों के सामने उनके श्रवण करते हुए विनय पूर्वक यह वचन भगवान् शम्भु से कहे थे ।६९। हे स्वामिन् ! आप तो सर्वज्ञ हैं और सबकी आत्मा हैं। क्या आपको यह विदित नहीं है तो भी विज्ञापन करते हुए मेरे यह वचन को अब धारण कीजिए ।७०।