संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६७
यदि शक्रादिभिर्देवैरखिलैरमरारयः । न शक्या हंतुमेकस्य शक्याः स्युस्ते कथं मम ॥७१॥ अनस्त्रज्ञोऽस्मि देवेश युद्धानामप्यकोविदः । कथं हनिष्ये सकलान्सुरशत्रूननायुधः ॥७२ इत्युक्तस्तेन देवेशः सितं कालाग्निसप्रभम् । शैवमस्त्रमयं तेजो ददौ तस्मै महात्मने ॥७३ आत्मीयं परशुं दत्त्वा सर्वशस्त्राभिभावकम् । राममाह प्रसन्नात्मा गीर्वाणानां तु शृण्वताम् ॥७४ मत्प्रसादेन सकलान्सुरशत्रून्वनिघ्नतः । शक्तिर्भवतु ते सौम्य समस्तारिदुरासदा ॥७५ अनेनैवायुधेन त्वं गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः । स्वयमेव च वेत्सि त्वं यथावद्युद्धकौशलम् ॥७६ वसिष्ठ उवाच—एवमुक्तस्ततो रामः शंभुना तं प्रणम्य च । जग्राह परशुं शैवं विबुधारिवधोद्यतः ॥७७
यदि इन्द्र आदि समस्त देवों के द्वारा देवों के शत्रुगण दैत्य लोग मारे नहीं जाते हैं तो मुझ एक के द्वारा वे सब कैसे मारे जा सकते हैं ॥७१॥ हे देवेश ! मैं तो अस्त्रों के विषय में भी अज्ञ हूँ और युद्धों के करने में भी पण्डित नहीं हूँ । बिना ही आयुधों वाला मैं किस तरह से समस्त देवों के शत्रु असुरों का अकेला हनन करूँगा ॥७२। उस राम के द्वारा इस रीति से कहे गये देवेश्वर शम्भु ने कालाग्नि के समान प्रभा वाले सित अब अस्त्रों से परिपूर्ण शैव तेज उस महान आत्मा वाले को दे दिया था ॥७३। उन्होंने सब शस्त्रों के अभिभावक अपने परशु को प्रदान कर प्रसन्न आत्मा वाले शिव ने समस्त देवगणों के सुनते हुए उस राम से कहा था ॥७४। हे सौम्य ! मेरे प्रसाद से समस्त देवों के शत्रुओं का हनन करते हुए तुम्हारे अन्दर ऐसी ही शक्ति हो जावेगी जो सब अरिओं को दुरासद अर्थात् अतीव असह्य होगी ॥७५। इसी एक मात्र आयुध को ग्रहण कर तुम चले जाओ और सब शत्रुओं के साथ युद्ध करो । तुम अपने ही आप स्वयं यथा रीति से युद्ध करने के कौशल को जान जाओगे ॥७६। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस तरह से जब भगवान्